मेरा वोट उसको जो करे मेरी जान की चिंता

राजकुमार जैन, स्वतंत्र विचारक और लेखक

भारत सरकार की आधिकारिक वेब साईट पर हालिया जारी आंकड़े अखबारों के मुखपृष्ठ की सुर्खियां बने थे।मध्यप्रदेश में कोरोना महामारी के कारण 2019 से 2022 के दौरान जहां कुल 10786 मौत दर्ज हुई हैं, वहीं इसी कालखंड में 47877 मौत विभिन्न सडक़ दुर्घटनाओं में हुई है। कोरोना के मुकाबले चार गुना से भी अधिक, भयावह है यह आंकड़े।

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कोरोना के बारे तो हर स्तर पर चर्चा हुई और उससे मुकाबला करने के लिए हर शख्स जी जान से जुट गया था। क्या तो मीडिया, क्या सरकार, क्या स्वयंसेवी संस्थान और क्या एक आम नागरिक हर कोई कोरोना गाइडलाइन का पालन कर रहा था और दूसरों से उसका पालन करवाना भी सुनिश्चित कर रहा था। लेकिन कोविड से कई गुना बड़ी इस सडक़ दुर्घटना की महामारी से निपटने के लिए कहीं कोई हलचल दिखाई नहीं पड़ती, कोई आहट तक सुनाई नहीं पड़ती। कोई यातायात गाइड लाइन के पालन की बात तक नहीं करता।

इस महामारी के कारण प्रदेश के हर परिवार ने अपने किसी परिजन या मित्र को खोया है। इसके रौद्र रूप के चलते आज हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि जैसे ही घर कोई सदस्य वाहन लेकर निकलता है, गृहणी का कलेजा मुंह को आने लगता है। वो स्वत: ही ईश्वर से उनकी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने लग जाती है और जब तक वाहन लेकर निकला वो सदस्य सुरक्षित घर ना लौट आए तब तक उसके मन को चैन नहीं पड़ता। अहम सवाल यह है कि क्यों हावी है यह असुरक्षा की भावना । क्यों हम सडक़ों पर अपने आप को सुरक्षित अनुभव नहीं करते। लेकिन बुरी बात यह है कि सब इस सवाल से सब मुंह छुपाते नजर आते हैं।

कोई भी अखबार उठा कर देख लीजिए, कोई भी न्यूज चैनल देख लीजिए, प्रतिदिन सडक़ दुर्घटना में हताहत हो रहे लोगों की तस्वीर और समाचार प्रमुखता से दिखाई पड़ते हैं। लेकिन किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती। कोई यह तक नहीं पूछता कि ऐसा क्यों हो रहा है। सडक़ दुर्घटना सबसे बड़ी महामारी है जिसके कारण लगातार साल दर साल हो रही मृत्यु के आंकड़े चौंकाने वाले है। सडक़ पर मरने वालों की संख्या मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी करोना के कारण हुई मृत्यु से भी कई गुना अधिक है।

इस बीमारी या महामारी की सबसे बड़ा कारण (वायरस) है, नादान वाहन चालकों द्वारा गैर अनुशासित तरीके से वाहन चलना। इस कारण के बारे में सबको जानकारी है लेकिन फिर भी इसके निदान के लिए कोई स्थाई उपाय नहीं किए जाते हैं। आजाद भारत के 76 सालों के इतिहास में इससे लडऩे के लिए यातायात नियम पालन का कोई एंटी वायरस या टीका खोजने का प्रयास तक नहीं किया गया है। हम सबने इस कारण हो रही मौतों को अपनी नियति मान लिया है।

होना तो यह चाहिए था कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यातायात नियमों के पालन हेतु जन जागरूकता फैलाना राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में प्रमुख स्थान पाता। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि लोगों के जीवन जुड़ा यह इतना बड़ा और संवेदनशील मुद्दा कभी भी किसी भी राजनीतिक दल के लिए चिंता का विषय बना ही नहीं।

किसी सडक़ दुर्घटना में अकाल मृत्यु (आम भाषा में कुत्ते की मौत) के चलते अपने किसी परिजन को खो देने का दारुण दु:ख सिर्फ वो परिवार ही जानता है जिसके घर अंधेरा हुआ है, जिनका कोई चिराग इस अनुशासनहीन वाहन चालान की आंधी में बुझा है। इस जानलेवा रोग की रोकथाम की दिशा में ठोस कदम उठाने की बजाय सडक़ दुर्घटना में मृत्यु केवल अखबार की सुर्खी बढ़ाने के काम आने वाली घटना भर बन कर रह गई है।

इसके प्रमुख कारण अनुशासनहीन वाहन चालन पर कोई ध्यान नहीं देता। इस पर कभी कोई चर्चा नहीं होती, यातायात नियमों को अपनी जीवन शैली में अपनाने के बारे में विद्यालयों में कोई पाठ नही पढ़ाया जाता, यह किसी धार्मिक, सामाजिक या राजनेता के एजेंडे में नहीं होता, विधायी सदनों में जनप्रतिनिधियों द्वारा इस बारे कोई गंभीर चिंता प्रकट नहीं की जाती, यहां तक कि अपने बच्चे को गाड़ी दिलवाते समय अभिभावक भी उससे यातायात नियम पालन करने को नहीं कहते। यह हमारे समाज की एक गंभीर विडंबना है कि हम हमेशा दूसरों से ही अपेक्षा करते है लेकिन स्वयं नियमों को नही अपनाते।

लेकिन अब समय आ गया है कि अपना जनप्रतिनिधि चुनते समय यह विषय भी आपकी प्राथमिकता में होना चाहिए कि आने वाले समय में आपका कोई प्रियजन सडक़ दुर्घटना में ना मारा जाय, इसके लिए जरूरी है सडक़ पर अनुशासन और यातायात नियम पालन। और जो इस बात को नहीं माने उसे मिलनी चाहिए सख्त सजा क्योंकि ये लापरवाह और उच्छरखंल वाहन चालक कहीं ना कहीं सडक़ों पर हो रही दुर्घटना और मृत्यु के लिए किसी ना किसी रूप में उत्तरादायी होते हैं।

अब समय आ गया है आवाज उठाने का। अपने उम्मीदवार से बात करिए उससे शपथ लीजिए कि वो इस दिशा में लगातार काम करेंगे और हर संभव प्रयास करेंगे आपके परिवार को सुरक्षित रखने का, सडक़ पर हो रही मृत्यु दर को कम करने का। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि एक बाहुबली नेता के रूप में वो नियम तोडऩे वाले दोषियों को बचाने की बजाय उन्हें सजा दिलवाने का काम करेंगे।

आखिरकार यह हमारी और हमारे अपने लोगों की सुरक्षा का सवाल है। हमारे जीवन से सीधे तौर पर जुड़ी इस बात से अब भी मुंह मोडऩा सरासर बेशर्मी होगी। अपने ही परिजनों से गद्दारी जैसी बात होगी।