11,501 करोड़ की मेट्रो योजना पर सवाल, सवारी नहीं मिलने से सीमित हुआ इंदौर मेट्रो का संचालन

शहर की ट्रैफिक समस्या का स्थायी समाधान मानी जा रही इंदौर मेट्रो अब यात्रियों की कमी से जूझ रही है। स्थिति यह है कि मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने रविवार से मेट्रो संचालन को केवल एक फेरे तक सीमित कर दिया है। करीब 11,501 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का दिन में महज 25 मिनट चलना, योजना और जमीनी जरूरतों के बीच के अंतर को उजागर करता है।

31 मई 2025 से शुरू हुई थी आम यात्रियों की सेवा

इंदौर मेट्रो का आम नागरिकों के लिए संचालन 31 मई 2025 को शुरू किया गया था। शुरुआत में यह उम्मीद की जा रही थी कि सुपर कॉरिडोर पर मेट्रो को बड़ी संख्या में यात्री मिलेंगे, लेकिन वास्तविक आंकड़े उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे। यात्रियों की संख्या कम रहने के कारण अब रविवार को मेट्रो केवल एक राउंड ही लगाएगी।

दिन में सिर्फ एक फेरा, 25 मिनट की सेवा

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मेट्रो गांधी नगर स्टेशन से दोपहर 3 बजे रवाना होगी और सुपर कॉरिडोर-03 स्टेशन से 3:25 बजे वापस लौटेगी। इसके बाद आम यात्रियों के लिए सेवा बंद कर दी जाएगी। प्रबंधन का कहना है कि शेष समय में गांधी नगर से मालवीय नगर तक ट्रायल रन और तकनीकी परीक्षण किए जाएंगे। फिलहाल मेट्रो सिर्फ पांच स्टेशनों के बीच ही सीमित है, जिससे न तो पूरी कनेक्टिविटी मिल पा रही है और न ही यात्रियों का समय बच पा रहा है।

प्रबंधन का पक्ष: काम अभी जारी

मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक एस. कृष्ण चैतन्य के अनुसार, परियोजना का कार्य अभी पूर्ण नहीं हुआ है। यात्रियों की संख्या कम होने के चलते फिलहाल संचालन को एक फेरे तक सीमित किया गया है। उनका कहना है कि जैसे ही सभी कार्य पूरे होंगे और सभी स्टेशनों पर मेट्रो शुरू होगी, इसका सीधा लाभ यात्रियों को मिलेगा।

अधूरी कनेक्टिविटी बनी बड़ी वजह

शहरी परिवहन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शहर में मेट्रो तब सफल होती है, जब पूरा रूट चालू हो, फीडर बस सेवा, पार्किंग और लास्ट माइल कनेक्टिविटी उपलब्ध हो। इंदौर मेट्रो में फिलहाल ये तीनों व्यवस्थाएं अधूरी हैं। केवल ट्रैक बना लेना पर्याप्त नहीं है, जब तक यात्रियों तक आसान पहुंच न हो।

आधे-अधूरे कॉरिडोर से नहीं बनती यात्रियों की आदत

अर्बन ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट्स का कहना है कि अधूरे कॉरिडोर पर मेट्रो चलाने से लोगों में इसका नियमित उपयोग करने की आदत नहीं बनती। जब तक पूरी लाइन, भरोसेमंद समय-सारणी और इंटरचेंज सुविधाएं नहीं मिलतीं, तब तक यात्री निजी वाहनों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते।

भविष्य को लेकर बढ़ी चिंता

अनुमान है कि अगले डेढ़ साल तक इंदौर मेट्रो ट्रायल मोड में ही रहेगी। इससे यात्रियों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है और राजस्व घाटा बढ़ने की आशंका है। यदि मार्च 2026 तक पूरा कॉरिडोर शुरू नहीं हो पाया, तो यह परियोजना कम उपयोग का उदाहरण बन सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार इंदौर मेट्रो की समस्या ट्रैक या तकनीक की नहीं, बल्कि प्लानिंग की है। जब हजारों करोड़ रुपये की परियोजना दिन में सिर्फ 25 मिनट सिमट जाए, तो सवाल केवल यात्रियों की संख्या का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम और रणनीति का खड़ा होता है।