2006 मालेगांव ब्लास्ट: बॉम्बे HC ने ट्रायल पर लगाई रोक, कहा-बिना ठोस सबूत नहीं चलेगा केस; 4 को मिली बड़ी राहत

Mumbai News: 2006 के मालेगांव बम धमाकों के मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ आया है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस केस की विशेष अदालत (Special Court) में चल रही कार्यवाही पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। अदालत के इस फैसले से चार प्रमुख आरोपियों—लोकेश शर्मा, राजेंद्र चौधरी, धनसिंह और मनोहर नरवरिया को बड़ी राहत मिली है।

ठोस सबूतों का अभाव और असीमानंद का बयान

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बिना किसी ठोस और पुख्ता सबूत के ट्रायल को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। गौरतलब है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस मामले में स्वामी असीमानंद के 2010 के उस बयान को आधार बनाया था, जिसमें उन्होंने ‘छह लड़कों’ की संलिप्तता की बात कही थी। हालांकि, बाद में असीमानंद ने अपना बयान वापस ले लिया था और आरोप लगाया था कि उनसे यह बयान दबाव में दिलवाया गया था।

सुनवाई के दौरान आरोपियों के वकील कौशिक म्हात्रे ने तर्क दिया कि इस मामले में कोई भी प्रत्यक्षदर्शी गवाह मौजूद नहीं है। उन्होंने दलील दी कि जिस बयान को मुख्य आधार बनाया गया था, जब वह स्वयं विवादित और खारिज हो चुका है, तो उसके आधार पर आरोप तय करना न्यायसंगत नहीं है। कोर्ट ने इन तर्कों को स्वीकार करते हुए ट्रायल रोकने का आदेश दिया।

लंबा कानूनी संघर्ष और जेल यात्रा

मामले के आरोपी महू के लोकेश शर्मा और देपालपुर के राजेंद्र चौधरी को 2013 में गिरफ्तार किया गया था। वे लगभग छह साल जेल की सलाखों के पीछे रहे। 2019 में जब हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी थी, तब भी अदालत ने टिप्पणी की थी कि बिना ट्रायल के किसी को इतने लंबे समय तक जेल में रखना मानवाधिकारों के अनुकूल नहीं है। सितंबर 2025 में विशेष अदालत द्वारा आरोप तय किए जाने के बाद, इन आरोपियों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके परिणामस्वरूप जनवरी 2026 में यह स्टे (रोक) आया है।

क्या था 2006 का मालेगांव धमाका?

8 सितंबर 2006 को नासिक जिले के मालेगांव में जुमे की नमाज के बाद हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान के पास सिलसिलेवार धमाके हुए थे। इन विस्फोटों में 31 निर्दोष लोगों की मौत हुई थी और 312 से अधिक लोग घायल हुए थे।

इस संवेदनशील मामले की जांच की दिशा कई बार बदली। शुरुआत में एटीएस (ATS) ने नौ मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया था, लेकिन 2016 में सबूतों के अभाव में उन्हें बरी कर दिया गया। बाद में जांच सीबीआई और फिर एनआईए को सौंपी गई, जिसने दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों को आरोपी बनाया था। अब हाईकोर्ट के इस फैसले ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली और सबूतों की गुणवत्ता पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।