सौर तूफान से दुनिया में हड़कंप, भारत में एयरबस A300 की उड़ानें प्रभावित, 19 साल बाद G4 श्रेणी की चेतावनी जारी

लगभग दो दशकों में सबसे शक्तिशाली सौर तूफान ने पृथ्वी को अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे दुनिया भर में संचार और नेविगेशन प्रणालियों पर गंभीर असर पड़ा है। इस भू-चुंबकीय तूफान के कारण भारत में एयरबस-300 मॉडल के कई विमानों की उड़ानों में देरी हुई, जबकि कई अन्य देशों में उड़ानें रद्द कर दी गईं। अमेरिकी राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA) ने 2005 के बाद पहली बार G4-श्रेणी की ‘गंभीर’ चेतावनी जारी की है।

यह सौर तूफान सूर्य पर हुए कई शक्तिशाली विस्फोटों का नतीजा है, जिन्हें कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) कहा जाता है। ये विस्फोट सूर्य के एक बड़े सनस्पॉट क्लस्टर AR3664 से हुए हैं, जिसका आकार पृथ्वी से लगभग 17 गुना बड़ा है। शुक्रवार रात से शुरू हुआ यह तूफान सप्ताहांत तक जारी रहने की उम्मीद है।

विमानन सेवाओं पर व्यापक असर

सौर तूफान का सबसे बड़ा प्रभाव विमानन क्षेत्र पर पड़ा है। ये तूफान हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो संचार और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) को बाधित करते हैं, जो उड़ानों के सुरक्षित संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं। विशेष रूप से ध्रुवीय मार्गों पर उड़ान भरने वाले विमानों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में एयरबस-300 विमानों के संचालन में देरी दर्ज की गई है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी उड़ानें प्रभावित हुई हैं, लेकिन एयरलाइंस स्थिति पर करीब से नजर रख रही हैं। दुनिया के अन्य हिस्सों में भी विमानन कंपनियों ने एहतियाती कदम उठाते हुए अपनी कुछ उड़ानें रद्द कर दी हैं ताकि किसी भी अप्रिय घटना से बचा जा सके।

क्या है G4-श्रेणी का सौर तूफान?

NOAA का स्पेस वेदर प्रेडिक्शन सेंटर (SWPC) भू-चुंबकीय तूफानों को G1 (मामूली) से लेकर G5 (अत्यधिक) तक के पैमाने पर मापता है। वर्तमान तूफान G4 श्रेणी का है, जिसे ‘गंभीर’ माना जाता है। इस स्तर के तूफान में पावर ग्रिड में वोल्टेज नियंत्रण संबंधी समस्याएं, उपग्रहों के संचालन में कठिनाई और रेडियो संचार में व्यापक बाधाएं आ सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह तूफान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकरा रहा है, जिससे संचार प्रणालियों के अलावा पावर ग्रिड और सैटेलाइट्स को भी खतरा हो सकता है।

ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य की चिंताएं

इससे पहले अक्टूबर 2005 में इस स्तर का सौर तूफान देखा गया था। इतिहास का सबसे शक्तिशाली दर्ज किया गया सौर तूफान 1859 का ‘कैरिंगटन इवेंट’ था, जिसने दुनिया भर में टेलीग्राफ नेटवर्क को ठप कर दिया था और कई ऑपरेटरों को बिजली के झटके लगे थे।

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ‘कैरिंगटन इवेंट’ जैसा तूफान आज आता है, तो यह हमारी आधुनिक तकनीकी सभ्यता के लिए विनाशकारी हो सकता है। यह दुनिया भर में बिजली और इंटरनेट को महीनों तक बाधित कर सकता है, जिससे खरबों डॉलर का नुकसान होने की आशंका है। फिलहाल, दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां इस मौजूदा तूफान की निगरानी कर रही हैं और इसके प्रभावों का आकलन कर रही हैं।