इंदौर में बीआरटीएस कॉरिडोर की रेलिंग हटाने और शहर की बिगड़ती ट्रैफिक व्यवस्था को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने बुधवार को सख्त रुख अपनाया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने प्रशासनिक सुस्ती पर गहरी नाराजगी जताई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब भोपाल में बीआरटीएस हटाने का फैसला हुआ तो महज 9 दिनों में काम पूरा कर सड़क चौड़ी कर दी गई, जबकि इंदौर में 10 महीने बीतने के बाद भी केवल एक हिस्से की रेलिंग हट पाई है।
इस मामले में प्रशासन की ओर से पेश रिपोर्ट और धीमी गति पर कोर्ट ने करीब पौन घंटे तक बहस सुनी। कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि काम में तेजी लाई जाए। मामले की अगली सुनवाई अब 12 जनवरी को तय की गई है।
अफसरों ने मांगा समय, कोर्ट ने तत्काल बुलाया
सुनवाई के दौरान एक नाटकीय घटनाक्रम भी देखने को मिला। दरअसल, कलेक्टर और निगम कमिश्नर की ओर से कोर्ट में एक आवेदन प्रस्तुत किया गया था। इसमें कहा गया कि अभी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरावलोकन (SIR) का काम चल रहा है, इसलिए उन्हें 16 फरवरी तक कोर्ट में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट दी जाए।
इस आवेदन पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि बीआरटीएस का काम भी उतना ही जरूरी है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अधिकारी आदेश की अवहेलना करने की कोशिश कर रहे हैं। बेंच ने आदेश दिया कि दोपहर ढाई बजे किसी भी हाल में अधिकारी कोर्ट में उपस्थित हों। कोर्ट की सख्ती के बाद दोपहर के सत्र में कलेक्टर शिवम वर्मा, निगम कमिश्नर दिलीप यादव और ट्रैफिक डीसीपी आनंद कलादगी डिवीजन बेंच के सामने पेश हुए।
याचिकाकर्ता की दलील- भोपाल हो गया, इंदौर क्यों नहीं?
याचिकाकर्ता राजलक्ष्मी फाउंडेशन की ओर से एडवोकेट अजय बागड़िया ने कोर्ट को बताया कि आपके आदेश के कारण ही अब तक का काम हो पाया है। हालांकि, उन्होंने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि भोपाल में प्रशासन ने 9 दिन में काम पूरा कर दिया था। इस पर कोर्ट ने भी सहमति जताते हुए प्रशासन से सवाल किया। याचिकाकर्ता की ओर से तंज कसते हुए कहा गया कि ‘वह भोपाल है इसलिए हो गया, यह इंदौर है इसलिए नहीं हो पा रहा है।’
आधा काम होने से बढ़ा ट्रैफिक का दबाव
कोर्ट में बताया गया कि वर्तमान में बीआरटीएस के एक हिस्से की रेलिंग हटाने से भंवरकुआं से विजय नगर की ओर जाने वाले वाहनों को सड़क का एक तिहाई हिस्सा मिल गया है, जिससे वहां राहत है। लेकिन, विजय नगर से भंवरकुआं जाने वाले हिस्से की रेलिंग अभी नहीं हटी है। इससे यह रास्ता काफी संकरा हो गया है और ट्रैफिक का दबाव बढ़ गया है।
डिवाइडर और सुरक्षा पर बहस
सुनवाई के दौरान रेलिंग हटाने के बाद डिवाइडर बनाने पर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि बीच में सीमेंट के ब्लॉक, पुलिस बैरिकेड्स या रस्सियां लगाकर अस्थाई डिवाइडर बनाए जाएं ताकि दूसरी तरफ की रेलिंग भी तोड़ी जा सके।
इस पर निगम कमिश्नर ने तर्क दिया कि सीमेंट ब्लॉक की लागत बहुत ज्यादा है और निगम के पास जो संसाधन थे, वे लगा दिए गए हैं। वहीं, अधिकारियों ने रस्सी या खंभे लगाने के सुझाव को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इससे दुर्घटनाएं बढ़ेंगी और लोग कूदकर सड़क पार करेंगे। इस पर याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि जो लोग नियम तोड़ेंगे, वे अपनी जिम्मेदारी पर ऐसा करेंगे, इसके लिए पूरे शहर को परेशान नहीं किया जा सकता।
सड़क पर मलबा और गिट्टी, हादसों का डर
कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि जहां रेलिंग हटाई गई है, वहां सड़क पर मलबा और गिट्टी बिखरी पड़ी है। पेंचवर्क भी समतल नहीं है, जिससे बाइक सवारों के फिसलने और दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा बना हुआ है। कोर्ट ने इस मलबे को तुरंत साफ करने और पेंचवर्क को सही तरीके से समतल करने की आवश्यकता जताई है।