मध्य प्रदेश में सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण के बहुप्रतीक्षित मुद्दे पर जबलपुर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हाईकोर्ट ने इस मामले से जुड़ी लगभग 40 याचिकाओं का एक साथ निराकरण कर दिया है। यह फैसला उन हजारों कर्मचारियों के लिए अहम है जो लंबे समय से अपनी पदोन्नति की राह देख रहे थे।
जबलपुर हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि पदोन्नति में आरक्षण को लेकर जो भी अंतिम स्थिति बनेगी, वह सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर निर्भर करेगी। इसका सीधा अर्थ है कि राज्य सरकार को अब शीर्ष अदालत के फैसले का इंतजार करना होगा और उसी के अनुरूप आगे की कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अधीन रहेगी प्रक्रिया
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पदोन्नति में आरक्षण का मामला फिलहाल देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन है। ऐसे में, राज्य स्तर पर दायर याचिकाओं का निराकरण करते हुए कोर्ट ने यह व्यवस्था दी है कि भविष्य में जो भी प्रमोशन होंगे, वे ‘सशर्त’ होंगे और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम वर्डिक्ट (निर्णय) के दायरे में आएंगे।
इस फैसले के बाद राज्य सरकार के लिए पदोन्नति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता तो खुल गया है, लेकिन अनिश्चितता के बादल पूरी तरह नहीं छटे हैं। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार अब सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत ही रोस्टर और आरक्षण के नियमों का पालन कर सकेगी।
लंबे समय से अटकी है प्रक्रिया
मध्य प्रदेश में पदोन्नति में आरक्षण का विवाद पिछले कई वर्षों से चल रहा है। वर्ष 2016 में जबलपुर हाईकोर्ट ने ही ‘मध्य प्रदेश लोक सेवा (पदोन्नति) नियम 2002’ को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था। इसके बाद से राज्य में हजारों अधिकारी और कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो गए।
सरकार ने हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां यह मामला अभी भी लंबित है। इस बीच, कई कर्मचारी संगठनों और व्यक्तियों ने हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाएं दायर कर राहत की मांग की थी। इन सभी 40 याचिकाओं को एक साथ क्लब करके कोर्ट ने यह ताजा आदेश जारी किया है।
कर्मचारियों में मिश्रित प्रतिक्रिया
हाईकोर्ट के इस फैसले पर कर्मचारी संगठनों की मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। सामान्य वर्ग के कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि रोस्टर प्रणाली में पारदर्शिता होनी चाहिए, जबकि आरक्षित वर्ग के संगठन अपने अधिकारों की रक्षा की मांग कर रहे हैं। फिलहाल सभी की निगाहें अब नई दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट पर टिक गई हैं, जहां से आने वाला फैसला ही इस विवाद का स्थाई समाधान तय करेगा।