नर्मदा के पावन तट पर बसा ओंकारेश्वर केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और शिवत्व का जीवंत स्वरूप है। यहां नर्मदा नदी का हर कण, हर पत्थर और हर कंकड़ भगवान शिव का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं की गहरी मान्यता है कि नर्मदा जल का स्पर्श मात्र से ही पुण्य की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि 12 ज्योतिर्लिंगों में चौथे स्थान पर विराजमान ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के एक क्षण के दर्शन के लिए भी देश-विदेश से भक्त यहां खिंचे चले आते हैं। अंग्रेजी नववर्ष के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ने की पूरी संभावना है। भक्तों का विश्वास है कि बाबा ओंकारेश्वर के दर्शन से सभी कष्ट दूर होते हैं और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।
नववर्ष को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क है। डिप्टी कलेक्टर एवं ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर प्रशासक मुकेश काशिव के अनुसार, नए साल के पहले दिन करीब एक लाख श्रद्धालुओं के ओंकारेश्वर पहुंचने का अनुमान है। इस दिन श्रद्धालु केवल सामान्य द्वार से ही दर्शन कर सकेंगे। किसी भी प्रकार की प्रोटोकॉल या वीआईपी दर्शन व्यवस्था बंद रहेगी, ताकि आम भक्तों को समान अवसर मिल सके और व्यवस्था संतुलित बनी रहे।
श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए दर्शन व्यवस्था में भी बदलाव किए गए हैं। भक्त अब सीढ़ियों की बजाय मंदिर के रैंप से होकर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकेंगे। प्रशासन के मुताबिक, कतार में खड़े श्रद्धालुओं को दो से ढाई घंटे में दर्शन हो जाएंगे। मंदिर गर्भगृह में सीमित स्थान होने के कारण एक समय में केवल चार श्रद्धालु ही बाबा के दर्शन कर पाते हैं। भारी भीड़ को देखते हुए मंदिर ट्रस्ट और प्रशासन द्वारा व्यापक प्रबंध किए जा रहे हैं।
दिसंबर के अंतिम पखवाड़े से ही ओंकारेश्वर में श्रद्धालुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। प्रशासन का स्पष्ट लक्ष्य है कि देश-विदेश से आने वाले भक्तों को दर्शन और नर्मदा स्नान के दौरान किसी भी प्रकार की परेशानी न हो। मंदिर ट्रस्ट के सभी कर्मचारी और सेवक लगातार व्यवस्थाओं में जुटे हुए हैं, ताकि भीड़ के बावजूद श्रद्धालुओं का अनुभव सुखद बना रहे।
ओंकारेश्वर मंदिर ट्रस्ट के मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं पुनासा एसडीएम पंकज वर्मा ने बताया कि वर्तमान में प्रतिदिन 50 से 60 हजार श्रद्धालु ओंकारेश्वर-ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर रहे हैं। नए साल 2026 में यह संख्या लाखों के पार जाने की संभावना है। उन्होंने बताया कि मंदिर की भौगोलिक स्थिति अन्य तीर्थ स्थलों से अलग है। ओंकार पर्वत की पहाड़ी पर सदियों पुराना मंदिर स्थित होने के कारण यहां बड़े स्तर पर बदलाव संभव नहीं हैं। कोरोना काल के बाद से श्रद्धालुओं की संख्या में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
श्रद्धालुओं की सुरक्षा और यातायात व्यवस्था के लिए पुलिस प्रशासन भी मुस्तैद है। ओंकारेश्वर थाना प्रभारी अनोख सिंधिया ने बताया कि छोटे वाहनों को नियंत्रित करने के लिए शहर में एक दर्जन से अधिक स्थानों पर पार्किंग सुविधा उपलब्ध कराई गई है। नववर्ष के दौरान नर्मदा स्नान, ओंकार पर्वत की परिक्रमा और ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए बड़ी संख्या में भक्त पहुंचेंगे। इसे देखते हुए स्थानीय पुलिस, होमगार्ड और अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है।
ओंकारेश्वर की महिमा केवल दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पौराणिक कथाएं भी इसे विशेष बनाती हैं। ओंकारेश्वर पंडा संघ के अध्यक्ष पंडित नवलकिशोर शर्मा के अनुसार, ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वयंभू स्वरूप है, यानी यह स्वयं प्रकट हुआ। एक मान्यता के अनुसार अयोध्या के इक्ष्वाकु वंश के राजा मांधाता ने नर्मदा तट पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर शिव यहां ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए।
मंदिर के पंडित नीलेश पुरोहित बताते हैं कि एक अन्य कथा में विंध्याचल पर्वत ने स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए भगवान शिव की आराधना की थी। शिव के प्रकट होने पर विंध्याचल को ओंकारेश्वर और ममलेश्वर के रूप में विभाजित किया गया। एक कथा यह भी कहती है कि असुरों से पराजित देवताओं की प्रार्थना पर भगवान शिव ने ओंकारेश्वर रूप में प्रकट होकर असुरों का संहार किया। ओम के आकार के इस पवित्र द्वीप पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है, जबकि ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग नर्मदा के दक्षिण तट ब्रह्मपुरी में विराजमान है।
शास्त्रों में उल्लेख है कि किसी भी तीर्थ की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती, जब तक वहां का जल ओंकारेश्वर में अर्पित न किया जाए। यह भी मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती प्रतिदिन रात्रि विश्राम के लिए इस मंदिर में आते हैं। इसी विश्वास के चलते हर रात मंदिर में चौपड़-पासे की बिछात बिछाई जाती है, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का अनोखा प्रतीक है।
ओंकारेश्वर केवल ज्योतिर्लिंग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आध्यात्म और संस्कृति का बड़ा केंद्र भी बनता जा रहा है। खंडवा जिले के ओंकारेश्वर में आदि गुरु शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है, जिसे देखने बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। यहां एकात्मधाम और अद्वैत लोक संग्रहालय का निर्माण भी किया जा रहा है। मान्यता है कि इसी भूमि पर शंकराचार्य ने अपने गुरु गोविंद भगवत्पाद से शिक्षा ग्रहण की थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव यहां ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए।
आज भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मांधाता द्वीप और ओंकार पर्वत की लगभग सात किलोमीटर लंबी परिक्रमा करते हैं। नववर्ष के अवसर पर ओंकारेश्वर में उमड़ने वाला यह जनसैलाब न केवल आस्था की शक्ति को दर्शाता है, बल्कि नर्मदा और शिव से जुड़े उस अद्भुत आध्यात्मिक संबंध को भी जीवंत करता है, जो सदियों से भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है।