Mumbai News : बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन और उनका बंगला ‘प्रतीक्षा’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं। हाल ही में बिग बी ने अपना यह पहला बंगला बेटी श्वेता नंदा को उपहार में दे दिया है, जिसके बाद इस घर से जुड़ी पुरानी यादें एक बार फिर चर्चा में हैं। जया बच्चन ने एक पुराने संस्मरण में खुलासा किया था कि जब यह परिवार पहली बार इस घर में रहने आया था, तब वहां बुनियादी सुविधाएं तक पूरी नहीं थीं।
बिना पर्दे और खिड़कियों का था शुरुआती सफर
जया बच्चन ने साल 2002 में एक लेख के जरिए 70 के दशक की अपनी यादें साझा की थीं। उन्होंने बताया कि साल 1976 में बच्चन परिवार ‘प्रतीक्षा’ में शिफ्ट हुआ था। दिलचस्प बात यह है कि उस समय घर का निर्माण पूरी तरह संपन्न नहीं हुआ था। जया के अनुसार, “हम तब वहां रहने चले गए थे जब घर में ठीक से खिड़कियां और पर्दे तक नहीं लगे थे।”
यह अमिताभ बच्चन के करियर का सबसे व्यस्त दौर था। एक तरफ वह ‘दीवार’ और ‘शोले’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों के जरिए सुपरस्टार बन रहे थे, वहीं दूसरी तरफ वह अपने सपनों का घर तिनका-तिनका जोड़कर बना रहे थे। जया बताती हैं कि घर पर वह एक सामान्य पति और पिता की तरह रहते थे और कभी भी काम का तनाव घर नहीं लाते थे।
पिता हरिवंशराय बच्चन ने दिया था यह खास नाम
अमिताभ बच्चन के इस बंगले का नाम उनके पिता और सुप्रसिद्ध कवि डॉ. हरिवंशराय बच्चन ने रखा था। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के एक एपिसोड में अमिताभ ने इसके पीछे की प्रेरणा का खुलासा किया था। उन्होंने बताया कि उनके पिता की एक कविता की पंक्ति है— “स्वागत सबके लिए है पर नहीं है किसी के लिए प्रतीक्षा”।

इसका अर्थ यह है कि इस घर के दरवाजे हर किसी के स्वागत के लिए सदैव खुले हैं, लेकिन यहाँ किसी का (इंतजार) नहीं किया जाता। यह दर्शन अनुशासन और स्वावलंबन को दर्शाता है, जिसे बच्चन परिवार ने दशकों तक आत्मसात किया।
यादों का झरोखा और बदलता स्वरूप
‘प्रतीक्षा’ सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि बच्चन परिवार की तीन पीढ़ियों का गवाह रहा है। अभिषेक बच्चन और श्वेता बच्चन का बचपन इसी आंगन में बीता। जया बच्चन ने बताया कि जैसे-जैसे अमिताभ का आत्मविश्वास और सफलता बढ़ती गई, घर की दीवारें भी उनकी यादों से सजती गईं। हालाकि अब यह बंगला पूरी तरह आधुनिक हो चुका है और इसे श्वेता नंदा को सौंप दिया गया है, लेकिन इसकी जड़ें आज भी उसी सादगी में बसी हैं जिसका जिक्र जया ने किया था।
आज भी जलसा और प्रतीक्षा के बाहर हजारों प्रशंसकों की भीड़ सिर्फ एक झलक पाने के लिए जुटती है, जो यह साबित करती है कि 1976 में शुरू हुआ यह सफर आज भी उतना ही भव्य और प्रेरणादायक है।