अक्सर वाहन मालिक पेट्रोल भरवाने, सर्विस कराने और गाड़ी की सफाई पर पूरा ध्यान देते हैं, लेकिन टायरों की स्थिति को नजरअंदाज कर देते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि सड़क से गाड़ी का सीधा संपर्क टायरों के जरिए ही होता है। टायरों की हालत का सीधा असर वाहन की सुरक्षा, ब्रेकिंग, ड्राइविंग आराम और माइलेज पर पड़ता है। समय पर टायर न बदलना हादसों की बड़ी वजह बन सकता है, इसलिए यह जानना बेहद जरूरी है कि टायर बदलने का सही समय कब होता है।
गाड़ी की पकड़ और नियंत्रण टायरों पर निर्भर
कार के टायर ग्रिप, संतुलन और स्टेयरिंग कंट्रोल की जिम्मेदारी निभाते हैं। पुराने या ज्यादा घिस चुके टायर ब्रेक लगाते समय दूरी बढ़ा देते हैं, बारिश में फिसलने का खतरा पैदा करते हैं और तेज रफ्तार में टायर फटने की आशंका भी बढ़ जाती है। कई बार गाड़ी चलाने में सब ठीक लगता है, लेकिन अंदर से कमजोर हो चुके टायर अचानक खतरा बन सकते हैं। इसी वजह से टायरों की नियमित जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।
5–6 साल में बदलना जरूरी
यह एक आम गलतफहमी है कि टायर सिर्फ घिसने पर ही बदलने चाहिए। हकीकत यह है कि इस्तेमाल कम होने पर भी टायरों को 5 से 6 साल के भीतर बदल देना चाहिए। समय के साथ धूप, गर्मी और हवा के संपर्क में आने से रबर कमजोर हो जाता है। यहां तक कि कम चली हुई कार के टायर भी उम्र पूरी होने पर असुरक्षित हो सकते हैं।
टायर की उम्र जानने के लिए उसके साइडवॉल पर मौजूद DOT कोड देखें। इसमें पहले दो अंक निर्माण सप्ताह और आखिरी दो अंक निर्माण वर्ष बताते हैं।
ट्रेड डेप्थ से पहचानें ग्रिप की स्थिति
टायर की पकड़ बनाए रखने में ट्रेड डेप्थ की भूमिका सबसे अहम होती है, खासतौर पर बरसात के मौसम में। भारत सहित कई देशों में ट्रेड डेप्थ की न्यूनतम कानूनी सीमा 1.6 मिमी तय है। अधिकतर टायरों में ट्रेड वियर इंडिकेटर (TWI) दिए होते हैं। जब टायर की गहराई इन संकेतों के बराबर हो जाए, तो समझ लें कि अब टायर बदलने का समय आ गया है। विशेषज्ञ बेहतर सुरक्षा के लिए 3 मिमी पर ही टायर बदलने की सलाह देते हैं, क्योंकि इससे नीचे आते देख ब्रेकिंग और गीली सड़क पर पकड़ तेजी से घटती है।
दरारें, कट और बार-बार पंचर खतरे की घंटी
अगर टायर की साइडवॉल पर दरारें या कट नजर आने लगें, तो यह रबर के कमजोर होने का संकेत है। इसी तरह असमान घिसावट व्हील एलाइनमेंट या सस्पेंशन में खराबी की ओर इशारा कर सकती है। बार-बार पंचर होना या बड़ी मरम्मत की जरूरत पड़ना भी टायर की खराब हालत को दर्शाता है। ऐसे संकेत दिखते ही टायर बदलने में देर नहीं करनी चाहिए।
औसतन कितनी चलती है टायरों की उम्र
सामान्य यात्री कारों के टायर औसतन 40,000 से 80,000 किलोमीटर तक चल सकते हैं। हालांकि यह ड्राइविंग स्टाइल, सड़क की हालत और टायर की क्वालिटी पर निर्भर करता है। तेज रफ्तार, अचानक ब्रेक लगाना और खराब सड़कों पर ज्यादा चलाने से टायर जल्दी घिस जाते हैं। वहीं, हाई-परफॉर्मेंस टायर आम टायरों की तुलना में कम समय में घिस सकते हैं।
टायरों की देखभाल के आसान उपाय
टायरों की उम्र बढ़ाने और सुरक्षा बनाए रखने के लिए हर 8,000 से 13,000 किलोमीटर पर टायर रोटेशन कराएं। साथ ही नियमित रूप से व्हील एलाइनमेंट और बैलेंसिंग करवाते रहें। सही हवा का दबाव बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
समय पर बदलाव ही सुरक्षा की कुंजी
टायर सिर्फ रबर के टुकड़े नहीं, बल्कि आपकी सुरक्षा का सबसे अहम हिस्सा होते हैं। 5–6 साल के नियम का पालन करना, ट्रेड डेप्थ पर नजर रखना और किसी भी तरह की क्षति को नजरअंदाज न करना बेहद जरूरी है। सही समय पर टायर बदलने से न सिर्फ आपकी कार सुरक्षित रहती है, बल्कि सड़क पर चल रहे अन्य लोगों की जान भी सुरक्षित रहती है।