पीएम आवास आवंटन में लापरवाही पर नगर निगम को फटकार, उपभोक्ता फोरम ने लगाया 2 लाख का जुर्माना

भोपाल। जिला उपभोक्ता फोरम ने एक महत्वपूर्ण फैसले में भोपाल नगर निगम की घोर लापरवाही पर सख्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री आवास योजना (PM Awas Yojana) के तहत आवंटित मकान को बिना सूचना के निरस्त करने और उसे किसी दूसरे व्यक्ति को आवंटित करने के मामले में फोरम ने निगम पर भारी जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने पीड़ित आवेदक को मानसिक प्रताड़ना के एवज में दो लाख रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया है।

यह मामला अरेरा कॉलोनी निवासी मोहम्मद आरिफ से जुड़ा है। आरिफ ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत आवेदन किया था, जिसमें उनका चयन भी हो गया था। उन्हें 12 नंबर बस स्टॉप स्थित मल्टी में एक फ्लैट आवंटित किया गया था। नियमनुसार उन्होंने निर्धारित राशि भी जमा कर दी थी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें आवास का कब्जा नहीं मिला।

बिना सूचना के निरस्त किया आवंटन

पीड़ित मोहम्मद आरिफ ने अपनी शिकायत में बताया कि फ्लैट अलॉट होने के बाद भी नगर निगम के अधिकारी उन्हें चाबी नहीं सौंप रहे थे। जब उन्होंने इस संबंध में जानकारी जुटाई, तो पता चला कि उनका आवंटन निरस्त कर दिया गया है। हैरानी की बात यह थी कि आवंटन निरस्त करने से पहले उन्हें न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही उनका पक्ष सुना गया। इसके बाद वह फ्लैट किसी अन्य व्यक्ति को दे दिया गया।

फोरम ने माना सेवा में कमी

इस मामले की सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता फोरम ने नगर निगम के रवैये को सेवा में गंभीर कमी (Deficiency in Service) माना। कोर्ट ने कहा कि जब आवेदक ने राशि जमा कर दी थी और लॉटरी में उनका नाम आया था, तो बिना विधिक प्रक्रिया के आवंटन रद्द करना गलत है। फोरम ने इसे अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में रखा।

व्याज समेत लौटानी होगी राशि

उपभोक्ता फोरम ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि नगर निगम को आवेदक द्वारा जमा की गई मूल राशि 9 प्रतिशत ब्याज के साथ लौटानी होगी। इसके अलावा, मानसिक कष्ट और परेशान करने के लिए दो लाख रुपये का अतिरिक्त हर्जाना भी देना होगा। साथ ही, वाद व्यय (legal expenses) के रूप में 5,000 रुपये अलग से चुकाने होंगे। कोर्ट ने यह भुगतान करने के लिए नगर निगम को दो महीने की मोहलत दी है।

निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल

यह फैसला प्रधानमंत्री आवास योजना के क्रियान्वयन में नगर निगम के स्तर पर हो रही गड़बड़ियों को उजागर करता है। अक्सर ऐसे मामलों में आवेदकों को दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं, लेकिन उपभोक्ता फोरम के इस कड़े फैसले से अधिकारियों की जवाबदेही तय होने की उम्मीद है। फोरम ने स्पष्ट किया कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और नियमों का पालन अनिवार्य है।