इंदौर दूषित जल मामला: हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, कहा- लोगों की जान से खिलवाड़ कर रहे अफसर, 50-50 हजार का जुर्माना लगेगा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने शहर में दूषित पानी की सप्लाई को लेकर नगर निगम के अधिकारियों के रवैये पर गहरी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जिम्मेदार अधिकारी लोगों की जान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। यह टिप्पणी उस जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें शहर के कई इलाकों में गंदे पानी की आपूर्ति का मुद्दा उठाया गया था।

न्यायमूर्ति सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति दुप्पला वेंकट रमना की युगल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम को सख्त निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि भविष्य में दोबारा शहर में दूषित पानी की आपूर्ति की शिकायत मिलती है, तो संबंधित जोनल अधिकारी पर व्यक्तिगत रूप से 50-50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा। यह राशि अधिकारियों के वेतन से काटी जाएगी।

अधिकारियों की दलीलों से कोर्ट नाखुश

सुनवाई के दौरान नगर निगम की ओर से पेश जवाब से कोर्ट संतुष्ट नजर नहीं आया। निगम ने अपने बचाव में तर्क दिया कि ड्रेनेज लाइन और पानी की लाइन पुरानी होने के कारण लीकेज की समस्या हो रही है, जिससे पानी दूषित हो जाता है। निगम ने यह भी कहा कि वे सुधार कार्य कर रहे हैं।

इस दलील पर जजों ने सख्त लहजे में पूछा कि क्या अधिकारी किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रहे हैं? कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि पुरानी लाइनों का बहाना बनाकर लोगों को जहरीला पानी नहीं पिलाया जा सकता। यह सीधे तौर पर नागरिकों के स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार (Article 21) का उल्लंघन है।

वैकल्पिक इंतजाम क्यों नहीं?

अदालत ने सवाल उठाया कि जब तक लाइनों की मरम्मत का काम चल रहा है, तब तक प्रभावित इलाकों में वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की गई? कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन क्षेत्रों में पानी गंदा आ रहा है, वहां टैंकरों के माध्यम से स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए। साथ ही, ड्रेनेज और पानी की लाइनों को अलग-अलग करने का काम युद्ध स्तर पर पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं।

क्या था पूरा मामला?

गौरतलब है कि इंदौर के कई इलाकों, विशेषकर पुरानी बस्तियों में पिछले कुछ समय से नलों में गंदे और बदबूदार पानी की शिकायतें आ रही थीं। रहवासियों का आरोप था कि कई बार शिकायत करने के बावजूद नगर निगम के अधिकारी सुध नहीं ले रहे थे। इसी मुद्दे को लेकर हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया था कि दूषित पानी पीने से लोग बीमार पड़ रहे हैं और महामारी फैलने का खतरा बना हुआ है।

निगम आयुक्त को शपथ पत्र देने के निर्देश

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक नगर निगम आयुक्त को व्यक्तिगत शपथ पत्र (Affidavit) प्रस्तुत करने का आदेश दिया है। इसमें उन्हें यह बताना होगा कि दूषित पानी की समस्या को पूरी तरह खत्म करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं और भविष्य का एक्शन प्लान क्या है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अब केवल कागजी खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा, जमीनी स्तर पर सुधार दिखना चाहिए।

कोर्ट की इस सख्ती से नगर निगम के अधिकारियों में हड़कंप मच गया है। उम्मीद की जा रही है कि अब शहर की जल वितरण व्यवस्था में सुधार के लिए तेजी से कदम उठाए जाएंगे।