New Delhi : दिल्ली-एनसीआर में गहराता वायु प्रदूषण अब केवल एक मौसमी समस्या नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य आपातकाल बन चुका है। साल 2025 में प्रदूषण के खतरनाक स्तर ने पिछले कई रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।
इस संकट के बीच अब देश की सर्वोच्च अदालत ने वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल खड़े किए हैं। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने यह बहस छेड़ दी है कि क्या करोड़ों का बजट और असीमित शक्तियां होने के बावजूद यह आयोग अपने मूल उद्देश्यों में पूरी तरह विफल साबित हुआ है?
सुप्रीम कोर्ट की फटकार: “गैर-जिम्मेदाराना है रवैया”
जनवरी 2026 में मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने CAQM को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आयोग प्रदूषण के वास्तविक स्रोतों (Root Causes) की पहचान करने और उनके स्थायी समाधान निकालने में नाकाम रहा है। कोर्ट ने आयोग के ढुलमुल रवैये को ‘गैर-जिम्मेदाराना’ करार देते हुए पूछा कि आखिर कब तक दिल्ली की जनता को केवल तात्कालिक प्रतिबंधों के भरोसे छोड़ा जाएगा?
GRAP: समाधान या सिर्फ खानापूर्ति?
आंकड़े बताते हैं कि CAQM की भूमिका अब केवल ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) को लागू करने तक सीमित होकर रह गई है। जैसे ही हवा जहरीली होती है, निर्माण कार्यों पर रोक, वाहनों पर प्रतिबंध और स्कूलों को बंद कर दिया जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये कदम ‘बीमारी के लक्षणों’ का इलाज तो करते हैं, लेकिन ‘बीमारी की जड़’ पर प्रहार नहीं करते।
विफलता के मुख्य बिंदु:
बजट बनाम परिणाम: आरटीआई से खुलासा हुआ है कि आयोग को प्रतिवर्ष करोड़ों का बजट मिलता है, जिसे फ्लाइंग स्क्वॉड और निरीक्षणों पर खर्च किया जाता है, लेकिन जमीन पर प्रदूषण कम होने का नाम नहीं ले रहा।
अधिकारों का प्रयोग नहीं: CAQM के पास राज्यों को आदेश देने और नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई की व्यापक शक्तियां हैं, फिर भी समन्वय की कमी साफ दिखती है।
तकनीकी विफलता: कर्तव्य पथ जैसे क्षेत्रों में एंटी-स्मॉग गन का उपयोग केवल एक दिखावा साबित हो रहा है, क्योंकि समग्र वायु गुणवत्ता में सुधार नहीं दिख रहा।
स्थायी समाधान की दरकार
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि दिल्ली-एनसीआर को केवल सर्दियों की ‘इमरजेंसी प्लानिंग’ नहीं, बल्कि पूरे साल की स्रोत-आधारित नीति की आवश्यकता है। जब तक कचरा प्रबंधन, औद्योगिक उत्सर्जन और पराली के स्थायी समाधान पर काम नहीं होगा, तब तक स्वच्छ हवा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित रहेगा।