इंदौर: शहर के सबसे पॉश और हरे-भरे इलाके, रेसीडेंसी क्षेत्र में एक सरकारी जमीन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहां न्यायपालिका के लिए आवंटित एक भूखंड पर जब प्रशासन ने दीवार का निर्माण शुरू कराया, तो सेवानिवृत्त IAS अधिकारियों और स्थानीय निवासियों ने شدید विरोध जताते हुए काम रुकवा दिया। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि यह जमीन मास्टर प्लान के तहत पार्क के लिए आरक्षित है, जबकि प्रशासन इसे 2021 में राज्य सरकार द्वारा दिया गया वैध आवंटन बता रहा है।
यह मामला अब इंदौर के दो सबसे प्रभावशाली वर्गों, न्यायपालिका और नौकरशाही, के बीच टकराव का कारण बन गया है। एक तरफ जजों के लिए आवास बनाने का सरकारी आदेश है, तो दूसरी तरफ शहर की विरासत और पर्यावरण को बचाने की मुहिम है।
सड़क पर उतरे पूर्व अधिकारी और निवासी
रविवार को लोक निर्माण विभाग (PWD) और नगर निगम की टीमों ने जैसे ही विवादित जमीन पर बाउंड्री वॉल का काम शुरू किया, स्थानीय लोग इकट्ठा हो गए। विरोध का नेतृत्व सेवानिवृत्त IAS अधिकारी अरुण कुमार भट्ट और विनोद सेमवाल ने किया। उन्होंने मौके पर पहुंचकर निर्माण कार्य को अवैध बताया और उसे तत्काल रोकने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों ने ‘रेसीडेंसी बचाओ संघर्ष समिति’ का गठन किया है। उनका कहना है कि इस क्षेत्र में 1500 से ज्यादा पुराने पेड़ हैं और यह शहर के लिए एक ‘ग्रीन लंग’ की तरह है। यहां किसी भी तरह का निर्माण पर्यावरण और इलाके की ऐतिहासिक पहचान को नष्ट कर देगा।
कलेक्टर बोले- ‘हम सिर्फ आदेश का पालन कर रहे’
बढ़ते विरोध के बाद प्रदर्शनकारियों का एक प्रतिनिधिमंडल इंदौर कलेक्टर आशीष सिंह से मिला। कलेक्टर सिंह ने स्पष्ट किया कि प्रशासन केवल सरकारी आदेशों का पालन कर रहा है। उन्होंने बताया,
“यह भूमि राजस्व विभाग की है और राज्य शासन ने 2021 में एक आदेश जारी कर इसे न्यायिक अधिकारियों के आवास के लिए आवंटित किया था।”
कलेक्टर ने प्रदर्शनकारियों को उस सरकारी आदेश की प्रति भी दिखाई। उन्होंने कहा कि यदि किसी को इस आवंटन से आपत्ति है, तो उन्हें सक्षम अदालत या सरकार के समक्ष अपनी बात रखनी चाहिए।
मास्टर प्लान बनाम सरकारी आवंटन
वहीं, ‘रेसीडेंसी बचाओ संघर्ष समिति’ ने प्रशासन के तर्क को सिरे से खारिज कर दिया है। समिति के सदस्यों का दावा है कि इंदौर के मास्टर प्लान में इस जमीन को स्पष्ट रूप से पार्क और ग्रीन बेल्ट के रूप में दर्शाया गया है। उनका तर्क है कि मास्टर प्लान एक कानूनी दस्तावेज है और राज्य सरकार का कोई भी आदेश उसका उल्लंघन नहीं कर सकता।
समिति ने अब इस मामले को हाईकोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। इसके अलावा, वे जल्द ही मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिलकर पूरे मामले से अवगत कराएंगे और आवंटन को रद्द करने की मांग करेंगे। फिलहाल, मौके पर तनावपूर्ण शांति है, लेकिन यह विवाद आने वाले दिनों में और गहराने की आशंका है।