मकर संक्रांति पर MP में सजेगा 1100 साल पुराना ऐतिहासिक मेला, लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद

जबलपुर: मध्य प्रदेश के जबलपुर में नर्मदा नदी के तट पर स्थित ऐतिहासिक तिलवारा घाट पर मकर संक्रांति का पर्व हर साल बड़े ही धूमधाम और आस्था के साथ मनाया जाता है। यह सिर्फ एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि लगभग 1100 साल पुरानी एक जीवंत परंपरा है, जो कल्चुरि राजवंश के समय से चली आ रही है। इस अवसर पर यहां एक विशाल मेला लगता है, जहां लाखों श्रद्धालु पवित्र नर्मदा में स्नान कर तिल और खिचड़ी का दान करते हैं।

1100 साल पुराना है इतिहास

इतिहासकारों के अनुसार, इस मेले की शुरुआत कल्चुरि राजवंश के राजा युवराज देव प्रथम (915-945 ईस्वी) के शासनकाल में हुई थी। उनकी पत्नी, रानी नोहला देवी, भगवान शिव की बहुत बड़ी उपासक थीं। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार, रानी नोहला देवी मकर संक्रांति के दिन तिलवारा घाट पर आकर सूर्य देव और नर्मदा नदी को तिल अर्पित करती थीं। माना जाता है कि इसी परंपरा से इस घाट का नाम ‘तिलवारा’ पड़ा, जो ‘तिल वारने’ यानी तिल अर्पित करने की क्रिया से बना है। तब से लेकर आज तक यह परंपरा बिना रुके जारी है।

क्या हैं धार्मिक मान्यताएं?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति पर सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। मां नर्मदा का वाहन ‘मकर’ (मगरमच्छ) है और मकर राशि का स्वामी शनि है। ऐसी मान्यता है कि जब सूर्य मकर राशि में आते हैं, तो नर्मदा के वाहन मकर को कष्ट होता है। उसके कष्टों को दूर करने के लिए तिल का दान किया जाता है। माना जाता है कि ऐसा करने से मां नर्मदा प्रसन्न होकर भक्तों को सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसी वजह से तिलवारा घाट पर तिल दान का विशेष महत्व है।

मेले का वर्तमान स्वरूप

हर साल 14 या 15 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन तिलवारा घाट पर आस्था का जनसैलाब उमड़ता है। दूर-दूर से लोग यहां पहुंचकर नर्मदा में पवित्र स्नान करते हैं और पूजा-अर्चना के बाद तिल, गुड़ और खिचड़ी जैसी वस्तुओं का दान करते हैं। घाट के आसपास एक विशाल मेला आयोजित होता है, जिसमें खाने-पीने की दुकानों से लेकर झूले और अन्य मनोरंजन के साधन भी होते हैं। यह मेला न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति और सामाजिक मेलजोल का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है।

तिलवारा घाट का महत्व केवल इस मेले तक ही सीमित नहीं है। यह वही स्थान है जहां राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की अस्थियों का विसर्जन भी किया गया था, जिससे इस घाट का ऐतिहासिक महत्व और भी बढ़ जाता है।