Varanasi : मोक्षदायिनी काशी के विश्वप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट पर चल रहे पुनर्विकास कार्यों ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। घाट के प्राचीन स्वरूप के साथ हुई कथित छेड़छाड़ और मूर्तियों के विस्थापन की खबरों के बीच इंदौर के होलकर राजवंश के वंशज और खासगी देवी अहिल्याबाई होलकर चैरिटीज ट्रस्ट के अध्यक्ष, यशवंतराव होलकर तृतीय वाराणसी पहुंचे।

उन्होंने न केवल क्षतिग्रस्त स्थलों का मुआयना किया, बल्कि प्रशासन से स्पष्ट मांग की है कि प्राचीन प्रतिमाएं उनके ट्रस्ट को सौंप दी जाएं ताकि उनकी गरिमा पुन: स्थापित की जा सके।
होलकर वंशज की सक्रियता और प्रशासन से संवाद
मणिकर्णिका घाट पर देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा निर्मित ऐतिहासिक संरचनाओं को क्षति पहुंचने की सूचना मिलते ही यशवंतराव होलकर वाराणसी पहुंचे। उन्होंने घाट पर पहुंचकर वहां मौजूद प्रतिमाओं की विधिवत पूजा-अर्चना की और उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से सफेद कपड़े से ढंक दिया।
यशवंतराव ने वाराणसी के निगमायुक्त और संभागायुक्त से मुलाकात कर अपनी गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “मां अहिल्या देवी द्वारा स्थापित चार प्राचीन प्रतिमाओं में से अब केवल दो ही शेष बची हैं। तोड़फोड़ की प्रक्रिया में इन धरोहरों को जो नुकसान पहुंचा है, वह पीड़ादायक है।

हमारी मांग है कि ये प्रतिमाएं खासगी ट्रस्ट को सौंपी जाएं ताकि हम उन्हें सुरक्षित और शास्त्रोक्त विधि से मंदिर में दोबारा स्थापित कर सकें।” उन्होंने प्रशासन से इस पूरे मामले की जांच करने और दोषियों पर कार्रवाई करने की भी अपील की है।
प्रशासन का रुख: “AI और भ्रामक वीडियो फैला रहे हैं अफवाह”
दूसरी ओर, वाराणसी के जिलाधिकारी (कलेक्टर) सत्येंद्र ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है कि मूर्तियों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाया गया है। प्रशासन का तर्क है कि घाट के सौंदर्यीकरण और पुनर्विकास के लिए कुछ संरचनाओं को अस्थायी रूप से हटाया गया है और उन्हें पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है।
कलेक्टर ने चेतावनी देते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से बनाए गए भ्रामक वीडियो प्रसारित किए जा रहे हैं ताकि जनता में रोष पैदा हो। प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि निर्माण कार्य पूर्ण होते ही सभी कलाकृतियों और मूर्तियों को उनके मूल स्थान पर सम्मानपूर्वक पुनर्स्थापित किया जाएगा। अफवाह फैलाने वालों को चिन्हित कर उन पर दंडात्मक कार्रवाई की तैयारी भी की जा रही है।
18 करोड़ का प्रोजेक्ट: मणिकर्णिका का नया कलेवर
मणिकर्णिका घाट, जहां वर्ष भर लाखों लोग अंतिम संस्कार और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आते हैं, वर्तमान में स्थान की कमी और गंदगी की समस्या से जूझ रहा है। इसी को देखते हुए 18 करोड़ रुपये के ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ (CSR) फंड से इसके कायाकल्प की योजना बनाई गई है।
परियोजना की मुख्य विशेषताएं:
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इंजीनियरिंग की चुनौती: घाट की मिट्टी दलदली होने के कारण 15 से 20 मीटर गहराई तक पाइलिंग (नींव) का काम किया गया है ताकि भविष्य में बाढ़ से निर्माण को खतरा न हो।
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पर्यावरण संरक्षण: शवदाह से निकलने वाली राख और धुएं से स्थानीय निवासियों को बचाने के लिए 25 मीटर ऊंची चिमनी का निर्माण किया जाएगा।
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आधुनिक सुविधाएं: शवों के स्नान के लिए पवित्र जलकुंड, मुंडन क्षेत्र, अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली और लकड़ी भंडारण के लिए अलग क्षेत्र बनाया जा रहा है।
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वास्तुकला: नए निर्माण में चुनार और जयपुर के गुलाबी पत्थरों का उपयोग किया जाएगा, जो काशी की प्राचीन आभा को बनाए रखेंगे।
विरोध के स्वर और इतिहास की गरिमा
इंदौर के प्रसिद्ध इतिहासकार सुनील मतकर और क्षत्रिय धनगर समाज ने प्रशासन की इस कार्रवाई पर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। मतकर के अनुसार, देवी अहिल्याबाई होलकर ने देश भर के तीर्थों का जीर्णोद्धार कराया था, जिनमें मणिकर्णिका घाट का विशेष स्थान है।
समाज का तर्क है कि विकास के नाम पर 300 साल पुरानी ‘मणि’ (पत्थर की प्राचीन संरचना) और अन्य विरासतों को हटाना सांस्कृतिक अपराध है। इस मुद्दे को लेकर समाज ने बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तैयार करने का निर्णय लिया है।
निष्कर्ष
वाराणसी का मणिकर्णिका घाट केवल एक श्मशान नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र और स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। एक तरफ जहां प्रशासन इसे आधुनिक सुविधाओं से लैस कर श्रद्धालुओं की राह आसान करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ इतिहास प्रेमी और होलकर ट्रस्ट इसकी प्राचीनता को बचाने की जंग लड़ रहे हैं। अब देखना यह होगा कि क्या विकास और विरासत के बीच कोई संतुलित रास्ता निकल पाता है या यह विवाद और गहराता है।