सोने और चांदी की कीमतों में जारी उतार-चढ़ाव और सट्टेबाजी को लेकर सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गई है। हॉट लाइन सामाजिक चरित्र चिंतन के तहत यह मुद्दा उठाया गया है कि कीमती धातुओं की अनियंत्रित सट्टेबाजी पर नकेल कसना अनिवार्य हो गया है। इस चर्चा में केवल आर्थिक पहलू ही नहीं, बल्कि इसके गहरे सामाजिक दुष्प्रभावों को भी रेखांकित किया गया है।
बाजार में सोने-चांदी की कीमतों में अस्थिरता का सीधा असर आम भारतीय परिवारों पर पड़ता है। विशेषकर शादी-विवाह के मौसम में यह संकट और गहरा जाता है। हॉट लाइन के मुताबिक, सरकार को इस दिशा में ठोस नीतिगत कदम उठाने चाहिए ताकि कृत्रिम रूप से बढ़ाई गई कीमतों पर नियंत्रण पाया जा सके।
माता-पिता के लिए जीवन-मरण का प्रश्न
भारतीय समाज में विवाह समारोहों के दौरान सोने के आभूषणों का आदान-प्रदान एक परंपरा रही है। हालांकि, अब यह परंपरा प्रतिष्ठा का पैमाना बन चुकी है। चिंतन में कहा गया है कि बेटी या बहू को कितना तोला सोना दिया गया, इस बात से माता-पिता का सामाजिक जीवन और मरण तय होने लगा है। यह दबाव परिवारों को आर्थिक रूप से तोड़ रहा है।
शादियों में आभूषणों की मांग को पूरा करने के लिए अभिभावक अपनी जीवन भर की पूंजी लगा देते हैं। समाज में अपनी नाक बचाने और रिश्तों को निभाने का यह दबाव इतना अधिक है कि कई बार यह माता-पिता के लिए अस्तित्व का संकट बन जाता है। सट्टेबाजी के कारण जब दाम बढ़ते हैं, तो यह बोझ कई गुना अधिक हो जाता है।
बेटी से ज्यादा सोने के वजन की अहमियत
सामाजिक चरित्र चिंतन में एक कड़वा सच सामने रखा गया है। वर्तमान दौर में ‘बेटी दी है’ इस बात का महत्व कम हो गया है, जबकि ‘सोना कितना दिया है’ इस बात से शादी की शोभा और वाह-वाही तय की जा रही है। यह मानसिकता वधू पक्ष पर अनावश्यक दबाव डालती है और विवाह जैसी पवित्र संस्था को व्यापारिक सौदे जैसा रूप दे देती है।
सामाजिक बदलाव की आवश्यकता
हॉट लाइन के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि सरकार को जहां एक ओर सट्टेबाजी पर रोक लगानी चाहिए, वहीं समाज को भी अपने चरित्र में बदलाव लाना होगा। जब तक विवाह में मान-सम्मान का आधार सोने का वजन रहेगा, तब तक मध्यम और गरीब वर्ग के परिवारों का शोषण होता रहेगा। सोने की चमक के पीछे छिपे परिवारों के संघर्ष को समझने और इस दिखावे की संस्कृति को त्यागने की अपील की गई है।