भारतीय करेंसी बाजार में बुधवार को बड़ी गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। कारोबारी सत्र की शुरुआत में ही रुपया टूटकर 91.20 के लेवल पर आ गया।
इससे पहले मंगलवार, 20 जनवरी को भी रुपये ने 91 का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लिया था। लगातार दो दिनों से जारी यह गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
बाजार के जानकारों के मुताबिक, घरेलू इक्विटी मार्केट में चल रही कमजोरी ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनाया है। निवेशक सतर्कता बरत रहे हैं और सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं। रुपये की यह ऐतिहासिक कमजोरी आयातकों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है।
गिरावट के मुख्य घरेलू कारण
रुपये में आ रही इस भारी गिरावट के पीछे कई अहम वजहें मानी जा रही हैं। सबसे बड़ा कारण मेटल इंपोर्टर्स (धातु आयातकों) की ओर से डॉलर की जबरदस्त मांग है। बाजार में डॉलर की कमी और मांग में बढ़ोतरी ने रुपये की कीमत को नीचे धकेल दिया है।
इसके अलावा, फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPI) द्वारा लगातार पैसा निकालना भी एक बड़ा फैक्टर है। विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपनी पूंजी निकालकर बाहर ले जा रहे हैं। इस ‘आउटफ्लो’ के चलते करेंसी मार्केट में डॉलर की सप्लाई प्रभावित हुई है और रुपया कमजोर हुआ है।
ग्लोबल मार्केट और ट्रंप का असर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अनिश्चितता का माहौल है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच ट्रेड टेंशन (व्यापार तनाव) बढ़ रहा है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ धमकियों और जवाबी ड्यूटी के बयानों ने ग्लोबल फाइनेंशियल बाजारों में घबराहट पैदा कर दी है। इस वजह से निवेशकों में डर का माहौल है और वे अमेरिकी इक्विटी में भी भारी बिकवाली कर रहे हैं।
इन वैश्विक घटनाओं का सीधा असर डॉलर इंडेक्स पर देखने को मिला है। मंगलवार को डॉलर इंडेक्स में काफी उतार-चढ़ाव रहा और यह 0.50 प्रतिशत गिरकर 98.37 पर बंद हुआ। हालांकि, डॉलर इंडेक्स की यह कमजोरी भी रुपये को संभालने में नाकाम रही है क्योंकि घरेलू कारण ज्यादा हावी हैं।
कच्चे तेल की कीमतें और भविष्य की राह
रुपये की कमर तोड़ने में कच्चे तेल की कीमतों का भी बड़ा हाथ है। भू-राजनीतिक (जियोपॉलिटिकल) तनाव के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल महंगा हो गया है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतें बढ़ने से देश का आयात बिल बढ़ गया है। इससे डॉलर की मांग और बढ़ गई है।
हालाकि, कुछ जानकारों का मानना है कि भारत-यूरोपीय यूनियन फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से रुपये को थोड़ा सहारा मिल सकता है। अगर यह समझौता सही दिशा में आगे बढ़ता है, तो करेंसी को कुछ सपोर्ट मिलने की उम्मीद है। फिलहाल, इस पूरे हफ्ते रुपये में उतार-चढ़ाव जारी रहने की आशंका जताई जा रही है।