प्रयागराज माघ मेला प्रशासन और शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के बीच विवाद गहरा गया है। मेला प्रशासन द्वारा जारी कानूनी नोटिस के जवाब में शंकराचार्य की ओर से सख्त विधिक प्रतिक्रिया भेजी गई है।
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अंजनि कुमार मिश्रा ने निर्धारित 24 घंटे की समय-सीमा समाप्त होने से पहले ही ई-मेल के माध्यम से यह जवाब प्रयागराज मेला प्राधिकरण को सौंप दिया है।
इस जवाब में मेला प्राधिकरण द्वारा 19 जनवरी 2026 को जारी किए गए पत्र पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। शंकराचार्य पक्ष ने इसे प्रशासन के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया है। वकील द्वारा भेजे गए पत्र में स्पष्ट किया गया है कि प्रशासन का यह कदम मनमाना और भेदभावपूर्ण है।
इसका उद्देश्य केवल शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को अपमानित करना और सनातन धर्म के अनुयायियों की भावनाओं को आहत करना प्रतीत होता है।
उत्तराधिकार और न्यायालय का हवाला
विधिक जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पद और अधिकारों को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की गई है। इसमें बताया गया है कि ब्रह्मलीन जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने साल 2017 में ही पंजीकृत वसीयत और घोषणा पत्र के जरिए उन्हें ज्योतिषपीठ बदरिकाश्रम का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। इसके बाद 12 सितंबर 2022 को वैदिक परंपराओं के अनुसार लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में उनका पट्टाभिषेक संपन्न हुआ था।
शंकराचार्य की नियुक्ति को चुनौती देने वाली एक याचिका को गुजरात हाईकोर्ट ने 2 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया था। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान भी यह तथ्य रिकॉर्ड पर लाया गया था कि पट्टाभिषेक की प्रक्रिया पहले ही पूरी हो चुकी है।
जवाब में यह भी उल्लेख है कि देश की अन्य प्रमुख पीठों—श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और भारत धर्म महामंडल—ने भी उनकी नियुक्ति का समर्थन किया है। वर्तमान में उनके पद या अधिकारों पर शीर्ष अदालत का कोई स्थगन आदेश (Stay Order) नहीं है।
प्रशासन को चेतावनी
शंकराचार्य के अधिवक्ता ने मेला प्रशासन के पत्र को न्यायालय में विचाराधीन मामले में सीधा हस्तक्षेप बताया है। उन्होंने इसे अदालत की अवमानना की श्रेणी में रखा है। जवाब में कहा गया है कि प्रशासन की इस हरकत से शंकराचार्य की सामाजिक प्रतिष्ठा और सम्मान को ठेस पहुंची है, साथ ही मीडिया में भ्रम की स्थिति पैदा हुई है।
अंत में मेला प्राधिकरण को स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि 19 जनवरी 2026 के विवादित पत्र को 24 घंटे के भीतर वापस लिया जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से मानहानि का मुकदमा, सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका और अन्य आवश्यक कानूनी कार्यवाही शुरू की जाएगी।