MP में OBC आरक्षण 27% पर निर्णय के संकेत, जल्द आ सकता है बड़ा और अहम फैसला

मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण के मसले पर एक बार फिर सबकी नजरें हाई कोर्ट पर टिक गई हैं। जबलपुर हाई कोर्ट में इस मामले की अंतिम सुनवाई 21 जनवरी को निर्धारित की गई है। यह मामला प्रदेश की सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश से सीधा जुड़ा है, जिस पर लंबे समय से कानूनी पेंच फंसा हुआ है।

जस्टिस शील नागू और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। कोर्ट में ओबीसी आरक्षण के समर्थन और विरोध में दायर कुल 63 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई होनी है। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता और सॉलिसिटर जनरल अपना पक्ष रखेंगे।

क्या है पूरा मामला?

इस विवाद की जड़ें वर्ष 2019 से जुड़ी हैं। तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था। इस फैसले को असंवैधानिक बताते हुए हाई कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गईं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी फैसले के अनुसार, कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने से प्रदेश में कुल आरक्षण की सीमा इस लक्ष्मण रेखा को पार कर जाती है।

भर्तियों पर गहरा असर

आरक्षण पर स्थिति साफ न होने के कारण मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) सहित कई सरकारी विभागों की भर्तियां प्रभावित हुई हैं। फिलहाल सामान्य प्रशासन विभाग ने ’87-13 फॉर्मूला’ लागू किया है। इसके तहत 87 प्रतिशत पदों पर नियुक्तियां दी जा रही हैं, जबकि 13 प्रतिशत पद ओबीसी और 13 प्रतिशत पद सामान्य वर्ग के लिए होल्ड (Hold) पर रखे गए हैं। कोर्ट के अंतिम फैसले के बाद ही यह तय होगा कि यह होल्ड किए गए 13 प्रतिशत पद किस वर्ग को मिलेंगे।

सरकार का पक्ष और उम्मीदें

राज्य सरकार लगातार 27 प्रतिशत आरक्षण के पक्ष में दलीलें देती रही है। सरकार का कहना है कि प्रदेश में ओबीसी की आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है, इसलिए उन्हें बढ़ा हुआ आरक्षण मिलना चाहिए। 21 जनवरी को होने वाली सुनवाई को ‘फाइनल हियरिंग’ माना जा रहा है। उम्मीदवारों को उम्मीद है कि कोर्ट जल्द ही इस पर कोई ठोस निर्णय देगा ताकि रुकी हुई नियुक्तियों का रास्ता पूरी तरह साफ हो सके।