बजट से पहले अर्थव्यवस्था का हिसाब-किताब, इस दिन दिखेगी असली तस्वीर

देश में इन दिनों हर तरफ बजट 2026 को लेकर चर्चा गर्म है। लोग जानना चाहते हैं कि आने वाले वित्त वर्ष में टैक्स को लेकर क्या राहत मिलेगी, महंगाई पर कितनी लगाम लगेगी और आम आदमी की जेब पर इसका क्या असर पड़ेगा। लेकिन इन तमाम उम्मीदों और अटकलों से ठीक एक दिन पहले संसद में एक ऐसा दस्तावेज पेश होता है, जो बजट से भी ज्यादा अहम माना जाता है। यही दस्तावेज देश की आर्थिक स्थिति की असली सच्चाई सामने लाता है, जिसे आर्थिक सर्वे (Economic Survey) कहा जाता है। अक्सर बजट के शोर-शराबे में यह रिपोर्ट आम लोगों की नजरों से ओझल रह जाती है, जबकि सच यह है कि बजट की नींव इसी पर टिकी होती है।

सरकार का सालाना रिपोर्ट कार्ड

आर्थिक सर्वे को केंद्र सरकार का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड कहा जाए तो गलत नहीं होगा। जैसे स्कूल में रिजल्ट यह बताता है कि छात्र ने पूरे साल कैसा प्रदर्शन किया, उसी तरह आर्थिक सर्वे यह दिखाता है कि बीते एक साल में देश की अर्थव्यवस्था किस दिशा में आगे बढ़ी। बजट जहां भविष्य की योजनाओं और वादों का खाका पेश करता है, वहीं आर्थिक सर्वे बीते साल की जमीनी हकीकत सामने रखता है। इसमें साफ-साफ बताया जाता है कि पिछले बजट में तय किए गए लक्ष्य कितने पूरे हुए और किन क्षेत्रों में सरकार पीछे रह गई। इससे यह समझने में आसानी होती है कि सरकारी दावे और वास्तविक स्थिति के बीच कितना फर्क है।

कौन तैयार करता है आर्थिक सर्वे?

यह अहम दस्तावेज वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा तैयार किया जाता है। इसकी पूरी जिम्मेदारी मुख्य आर्थिक सलाहकार (Chief Economic Advisor – CEA) की होती है। वर्तमान में यह पद वी. अनंत नागेश्वरन के पास है। उनकी अगुवाई में विशेषज्ञ अर्थशास्त्रियों की एक टीम साल भर कृषि, उद्योग, सेवा क्षेत्र, निर्यात-आयात और वैश्विक आर्थिक हालात से जुड़े आंकड़ों का गहराई से अध्ययन करती है। इन सभी आंकड़ों और विश्लेषण के आधार पर आर्थिक सर्वे तैयार होता है, जिसे वित्त मंत्री की मंजूरी के बाद संसद में पेश किया जाता है।

आम लोगों के लिए क्यों जरूरी है यह रिपोर्ट?

आर्थिक सर्वे सिर्फ सरकार या सांसदों के लिए ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी बेहद अहम होता है। इसमें महंगाई, बेरोजगारी, जीडीपी ग्रोथ और आर्थिक स्थिरता की स्पष्ट तस्वीर मिलती है। यह रिपोर्ट दो मुख्य हिस्सों में बंटी होती है। पहला हिस्सा देश की समग्र आर्थिक स्थिति यानी मैक्रो-इकोनॉमिक हालात पर केंद्रित होता है, जिससे यह पता चलता है कि अर्थव्यवस्था मजबूत है या दबाव में। दूसरा हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, सामाजिक विकास और जीवन स्तर जैसे विषयों पर फोकस करता है। अगर सर्वे में अर्थव्यवस्था मजबूत नजर आती है, तो बजट में टैक्स राहत और खर्च बढ़ाने की उम्मीद बनती है। वहीं कमजोर संकेत मिलने पर सख्त आर्थिक फैसले देखने को मिल सकते हैं।

29 जनवरी को सामने आएगी सच्चाई

इस बार वित्त वर्ष 2027 के लिए आर्थिक सर्वे को 29 जनवरी को संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाएगा। परंपरा के अनुसार, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इसे सदन के पटल पर रखेंगी। इसके बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए देश को बताएंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था फिलहाल किस हाल में है और आने वाले साल में क्या संभावनाएं दिख रही हैं। कुल मिलाकर, बजट से पहले आने वाला यह दस्तावेज सरकार की आर्थिक सोच और दिशा को समझने की सबसे अहम कुंजी माना जाता है।