चीन को चुनौती देने की तैयारी, भारत को ग्लोबल पावर बनाने का सरकार का बड़ा प्लान

भारत अब वैश्विक आर्थिक मंच पर अपनी भूमिका को नए सिरे से गढ़ने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। सरकार ने देश को दुनिया की अगली बड़ी “फैक्ट्री” के रूप में स्थापित करने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया है। अगर यह योजना जमीन पर उतरी, तो यह चीन जैसे पारंपरिक मैन्युफैक्चरिंग पावरहाउस के लिए चुनौती बन सकती है।

सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2035 तक देश के निर्यात को तीन गुना बढ़ाकर करीब 1.3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाया जाए। इस रणनीति की खास बात यह है कि इसमें बड़े पैमाने पर सब्सिडी देने के बजाय उन नियमों और प्रक्रियाओं को बदलने पर जोर दिया गया है, जो वर्षों से उद्योगों की राह में बाधा बने हुए थे।

पुरानी नीतियों से अलग है नई सोच

भारत लंबे समय से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करने की कोशिश करता आ रहा है। वर्ष 2014 में मेक इन इंडिया अभियान और 2020 में बड़े प्रोत्साहन पैकेज के बावजूद जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी को 25 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य पूरी तरह हासिल नहीं हो सका। सरकारी अधिकारियों का मानना है कि पहले की नीतियां अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाईं, क्योंकि वे संरचनात्मक समस्याओं को दूर करने में सक्षम नहीं थीं।

चुनिंदा सेक्टर्स पर केंद्रित होगी रणनीति

इस बार सरकार ने अपना दृष्टिकोण बदला है और सीमित लेकिन प्रभावशाली क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है। नई रणनीति के तहत लगभग 15 प्रमुख सेक्टर्स को चुना गया है, जिनमें सेमीकंडक्टर जैसे हाई-टेक उद्योगों के साथ-साथ धातु और लेदर जैसे रोजगार सृजन करने वाले क्षेत्र शामिल हैं। सरकार का मानना है कि सिर्फ वित्तीय सहायता देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि एक साहसिक और केंद्रित रणनीति की जरूरत है, जो सिस्टम के भीतर मौजूद कमजोरियों को दूर कर सके।

30 मैन्युफैक्चरिंग हब पर होगा बड़ा निवेश

नेशनल मैन्युफैक्चरिंग मिशन के अंतर्गत देशभर में करीब 30 मैन्युफैक्चरिंग हब विकसित करने की योजना बनाई गई है। इस परियोजना पर लगभग 100 अरब रुपये खर्च किए जाएंगे। इन हब्स को ऐसे क्षेत्रों में स्थापित किया जाएगा, जहां पहले से बुनियादी ढांचा मौजूद है या जो बंदरगाहों के पास स्थित हैं, ताकि निर्यात प्रक्रिया को सरल और तेज बनाया जा सके। इसके अलावा, सेमीकंडक्टर और ऊर्जा भंडारण जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों के लिए अतिरिक्त अनुदान की भी व्यवस्था की गई है।

बजट में हो सकती है बड़ी घोषणा

इस महत्वाकांक्षी योजना को अंतिम रूप देने का काम वित्त मंत्रालय और नीति आयोग द्वारा किया जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है कि 1 फरवरी को पेश होने वाले बजट में इस मिशन से जुड़ी अहम घोषणाएं की जा सकती हैं, हालांकि फिलहाल इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सरकार का उद्देश्य है कि नीति में स्पष्टता और स्थिरता लाई जाए, ताकि निवेशकों का भरोसा मजबूत हो।

लाल फीताशाही पर सीधा प्रहार

इस पूरी योजना का सबसे अहम पहलू नियमों और प्रक्रियाओं को सरल बनाना है। भारत में उद्योग लगाने वालों की सबसे बड़ी परेशानी लंबे समय से लाल फीताशाही रही है। फैक्ट्री लगाने के लिए बिजली, पानी और जमीन से जुड़ी मंजूरियों में महीनों या वर्षों लग जाते हैं। साथ ही, केंद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग नियम निवेशकों के लिए भ्रम और अतिरिक्त लागत पैदा करते हैं।

राज्यों के साथ समन्वय पर होगा जोर

इन समस्याओं के समाधान के लिए एक विशेष सरकारी पैनल के गठन की योजना है। इस पैनल की अध्यक्षता एक मंत्री करेंगे और इसमें शीर्ष स्तर के अधिकारी शामिल होंगे। पैनल का उद्देश्य राज्यों के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि उद्योगों को सस्ती और निर्बाध बिजली मिले। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि अलग-अलग राज्यों के श्रम और व्यापारिक नियमों में तालमेल हो, ताकि कंपनियों पर अनावश्यक बोझ न पड़े और भारत को एक आकर्षक मैन्युफैक्चरिंग डेस्टिनेशन बनाया जा सके।