इंदौर के प्रसिद्ध क्रिश्चियन कॉलेज की करीब 500 करोड़ रुपये मूल्य की जमीन को लेकर चल रहे विवाद में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है। राजस्व उपायुक्त सपना सोलंकी ने इस मामले में एसडीएम द्वारा दिए गए पूर्व आदेश पर रोक लगा दी है। एसडीएम ने इस बेशकीमती जमीन को सरकारी घोषित करते हुए इसे शासन के नाम दर्ज करने का फैसला सुनाया था।
कॉलेज प्रबंधन ने एसडीएम के इस निर्णय को संभागायुक्त कार्यालय में चुनौती दी थी। प्रारंभिक सुनवाई के बाद उपायुक्त ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आगामी आदेश तक यथास्थिति बनाए रखने के निर्देश दिए हैं। इस फैसले से कॉलेज प्रबंधन को बड़ी राहत मिली है, जबकि जिला प्रशासन की कार्रवाई फिलहाल थम गई है।
विवाद की जड़ और एसडीएम का फैसला
यह पूरा मामला इंदौर के छावनी क्षेत्र में स्थित क्रिश्चियन कॉलेज की करीब 13 एकड़ जमीन से जुड़ा है। अगस्त महीने में तत्कालीन एसडीएम ने एक विस्तृत जांच के बाद आदेश जारी किया था कि यह भूमि मूल रूप से सरकारी है। प्रशासन का तर्क था कि कॉलेज को यह जमीन जिस उद्देश्य के लिए दी गई थी, उसकी शर्तों का उल्लंघन हुआ है।
एसडीएम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि जमीन के रिकॉर्ड में हेरफेर की गई है और इसे विधिवत तरीके से शासन के खाते में वापस लिया जाना चाहिए। इसी आदेश के आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जिसे अब उपायुक्त ने रोक दिया है।
500 करोड़ की जमीन और कॉलेज का पक्ष
शहर के प्राइम लोकेशन पर स्थित इस जमीन की बाजार दर 500 करोड़ रुपये से अधिक आंकी गई है। कॉलेज प्रबंधन और यूनाइटेड चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया ट्रस्ट एसोसिएशन (UCNITA) का दावा है कि यह जमीन उनकी निजी संपत्ति है और इसके पास वैध दस्तावेज मौजूद हैं। प्रबंधन का कहना है कि एसडीएम को इस तरह का मालिकाना हक बदलने का अधिकार नहीं है।
कॉलेज की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने तर्क दिया कि दशकों से यह जमीन कॉलेज के कब्जे में है और यहां शैक्षणिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। उन्होंने प्रशासनिक कार्रवाई को नियमों के विरुद्ध बताते हुए स्टे की मांग की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पुराना संदर्भ
इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज की स्थापना 1887 में हुई थी और यह शहर के सबसे पुराने शिक्षण संस्थानों में से एक है। इस कॉलेज का गौरवशाली इतिहास रहा है और यहां से कई दिग्गज हस्तियां निकली हैं। जमीन विवाद का यह मामला नया नहीं है; पिछले कई वर्षों से प्रशासन और प्रबंधन के बीच पत्राचार और कानूनी दांव-पेच चल रहे हैं।
इससे पहले भी इस जमीन के कुछ हिस्सों को लेकर विवाद सामने आए थे, लेकिन हालिया प्रशासनिक सक्रियता ने इसे सुर्खियों में ला दिया था। अब सभी की निगाहें अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां दोनों पक्ष अपने-अपने साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे।