नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उज्जैन के विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में सभी श्रद्धालुओं के लिए एक समान प्रवेश नीति की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने साफ तौर पर कहा कि यह तय करना न्यायपालिका का काम नहीं है कि मंदिर के गर्भगृह में किसे और कैसे प्रवेश दिया जाए।
अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा, “यह कोई ऐसा मामला नहीं है जिसमें अदालत को हस्तक्षेप करना चाहिए। गर्भगृह में किसे प्रवेश की अनुमति दी जाए, यह पूरी तरह से मंदिर प्रशासन को तय करना है।” इस फैसले के साथ ही, मंदिर के आंतरिक मामलों में प्रबंधन समिति के अधिकारों को सर्वोच्च न्यायालय ने बरकरार रखा है।
याचिका में क्या थी मांग?
एक श्रद्धालु द्वारा दायर इस जनहित याचिका में यह दलील दी गई थी कि मंदिर के गर्भगृह में दर्शन और पूजा के लिए सभी भक्तों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए। याचिकाकर्ता ने वीआईपी और आम श्रद्धालुओं के बीच कथित भेदभाव को खत्म करने और एक समान नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि कुछ विशेष लोगों को आसानी से प्रवेश मिल जाता है, जबकि आम भक्तों को घंटों इंतजार करना पड़ता है या उन्हें प्रवेश ही नहीं मिलता।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह मंदिर समिति के अधिकार क्षेत्र का विषय है और वे ही इस पर निर्णय लेने के लिए सक्षम हैं। कोर्ट ने कहा कि देश में हजारों मंदिर हैं और अदालत हर मंदिर के दैनिक अनुष्ठानों और प्रवेश नियमों को विनियमित नहीं कर सकती। यह एक प्रशासनिक निर्णय है, जिसे मंदिर के ट्रस्ट या प्रबंधन द्वारा ही लिया जाना चाहिए।
मंदिर प्रशासन का अधिकार क्षेत्र
उल्लेखनीय है कि उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और यहां साल भर लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। श्री महाकालेश्वर मंदिर प्रबंधन समिति समय-समय पर भीड़ को नियंत्रित करने और शिवलिंग को क्षरण से बचाने के लिए गर्भगृह में प्रवेश के नियमों में बदलाव करती रहती है। वर्तमान में, आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में प्रवेश का समय सीमित है और इसके लिए एक विशेष ड्रेस कोड (पुरुषों के लिए धोती और महिलाओं के लिए साड़ी) का पालन करना भी अनिवार्य होता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि प्रवेश से जुड़े सभी नियम बनाने का अंतिम अधिकार मंदिर समिति के पास ही रहेगा।