स्कूली छात्राओं को बड़ी राहत, सुप्रीम कोर्ट का आदेश, कक्षा 6 से 12 तक मुफ्त सेनेटरी पैड अनिवार्य

देशभर की स्कूली छात्राओं के स्वास्थ्य और गरिमा से जुड़े एक बेहद अहम मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने आदेश दिया है कि अब कक्षा 6 से 12 तक की सभी छात्राओं को स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाएंगे। यह फैसला खासतौर पर सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में पढ़ने वाली करोड़ों लड़कियों के लिए एक बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है। अदालत ने साफ कहा है कि मासिक धर्म स्वच्छता किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं की जा सकती।

केंद्र सरकार की राष्ट्रीय नीति को मिली कानूनी मजबूती

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि स्कूली छात्राओं की मेंस्ट्रुअल हाइजीन सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर की नीति का ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया है। इस ड्राफ्ट को सभी संबंधित स्टेकहोल्डर्स के पास सुझाव और राय के लिए भेजा गया था। केंद्र ने अदालत को यह भी जानकारी दी थी कि चार हफ्तों के भीतर इस नीति को अंतिम रूप दे दिया गया है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद इस नीति के देशभर में प्रभावी क्रियान्वयन का रास्ता साफ हो गया है।

याचिकाकर्ता जया ठाकुर की पहल लाई बड़ा बदलाव

यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर द्वारा दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि देशभर के सरकारी और आवासीय स्कूलों में पढ़ने वाली कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त सेनेटरी पैड दिए जाएं और उनके लिए अलग शौचालय की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को गंभीरता से लेते हुए इसे केवल सुविधा नहीं, बल्कि लड़कियों के मौलिक अधिकार से जोड़कर देखा।

10 दिसंबर 2024 को सुरक्षित रखा गया था फैसला

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 10 दिसंबर 2024 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। इस दौरान जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह ‘स्कूल जाने वाली लड़कियों के लिए मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ के अखिल भारतीय कार्यान्वयन के लिए एक ठोस कार्य योजना तैयार करे। यह कार्य योजना एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी के माध्यम से अदालत के सामने रखी गई थी।

राज्यों को सख्त निर्देश, स्कूलों में अनिवार्य व्यवस्था

अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि स्कूल परिसरों के अंदर मुफ्त सेनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाएं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि कोई राज्य सरकार इस व्यवस्था को लागू करने में विफल रहती है, तो उसे इसके लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा। कोर्ट का मानना है कि इस तरह की लापरवाही सीधे तौर पर छात्राओं के स्वास्थ्य और शिक्षा दोनों को प्रभावित करती है।

प्राइवेट स्कूलों पर भी सख्ती, मान्यता रद्द करने की चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने निजी स्कूलों को भी कड़ी चेतावनी दी है। अदालत ने कहा है कि यदि प्राइवेट स्कूल लड़कियों और लड़कों के लिए अलग-अलग शौचालय और छात्राओं के लिए मुफ्त सेनेटरी पैड उपलब्ध कराने में असफल रहते हैं, तो उनकी मान्यता रद्द की जा सकती है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि शिक्षा के नाम पर चल रहे किसी भी संस्थान को बुनियादी सुविधाओं से समझौता करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

मासिक धर्म स्वास्थ्य को माना गया मौलिक अधिकार

अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि मासिक धर्म स्वास्थ्य का अधिकार, संविधान में दिए गए जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इसका मतलब यह है कि छात्राओं को स्वच्छता और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार है, और इसमें किसी भी तरह की कोताही असंवैधानिक मानी जाएगी।

दिव्यांग छात्रों के लिए भी विशेष निर्देश

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह भी निर्देश दिया है कि सभी स्कूलों में दिव्यांग-अनुकूल शौचालय उपलब्ध कराए जाएं। अदालत ने यह सुनिश्चित करने को कहा है कि स्कूलों में महिला और पुरुष छात्रों के लिए अलग-अलग शौचालय हों, ताकि किसी भी छात्र को असुविधा या अपमान का सामना न करना पड़े।

लापरवाही पर होगी जवाबदेही

अंत में सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि इस आदेश के पालन में किसी भी तरह की लापरवाही को गंभीरता से लिया जाएगा। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और स्कूल प्रबंधन—सभी को इस फैसले के लिए जवाबदेह ठहराया जाएगा। यह फैसला न सिर्फ छात्राओं के स्वास्थ्य की दिशा में बड़ा कदम है, बल्कि स्कूल शिक्षा व्यवस्था को ज्यादा संवेदनशील और समावेशी बनाने की ओर भी एक मजबूत पहल माना जा रहा है।