परीक्षा के समय समाज और परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी
वाराणसी
परीक्षा केवल प्रश्नपत्र और उत्तरपुस्तिका के बीच घटित होने वाली एक शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं है। यह एक ऐसा समय होता है जब किसी विद्यार्थी का मन, उसका आत्मविश्वास, उसका पारिवारिक परिवेश और पूरा सामाजिक वातावरण—सब मिलकर उसके भविष्य की दिशा तय करते हैं। परीक्षा के दिनों में बच्चे अकेले परीक्षार्थी नहीं होते; सच तो यह है कि उस अवधि में पूरा परिवार और समाज, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से, परीक्षार्थी बन जाता है।
आज जब बोर्ड परीक्षाएँ समीप आती हैं, तो समाज में अचानक एक विशेष प्रकार की हलचल दिखाई देने लगती है। जगह-जगह मोटिवेशनल भाषण, लंबे-चौड़े वक्तव्य, सोशल मीडिया पर उपदेशात्मक संदेश, सफलता के किस्से और असफलता से डराने वाले उदाहरण—सब कुछ एक साथ बच्चों पर बरसने लगता है। मंशा भले ही अच्छी हो, पर प्रश्न यह है कि क्या यही वह सहयोग है जिसकी एक परीक्षार्थी को सबसे अधिक आवश्यकता होती है?
परीक्षार्थी को इस समय सबसे अधिक आवश्यकता होती है—शांति, स्थिरता और अनुकूलता की। विषयवस्तु की तैयारी जितनी महत्त्वपूर्ण है, उतना ही महत्त्वपूर्ण वह मानसिक और भावनात्मक परिवेश है जिसमें वह तैयारी की जा रही है। ज्ञान तभी फलित होता है जब मन शांत हो, जब वातावरण सहयोगी हो और जब परीक्षार्थी स्वयं को सुरक्षित महसूस करे।
अक्सर यह देखा जाता है कि परीक्षा के समय घर का वातावरण अनजाने में ही तनावपूर्ण बना दिया जाता है। छोटी-छोटी बातों पर चर्चा, पारिवारिक समस्याओं का अनावश्यक विस्तार, रिश्तों के तनाव, भविष्य को लेकर आशंकाएँ—ये सब बातें उस मन पर अतिरिक्त बोझ डाल देती हैं, जो पहले ही परीक्षा की जिम्मेदारी से भरा होता है। बच्चे इन बातों को व्यक्त नहीं कर पाते, पर भीतर ही भीतर उनका मन विचलित होता चला जाता है।
यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि परीक्षा के दौरान परीक्षार्थी से अधिक अपेक्षा नहीं, बल्कि अधिक समझ की आवश्यकता होती है। उसे बार-बार यह याद दिलाना कि यह परीक्षा जीवन का निर्णायक मोड़ है, उसे और अधिक दबाव में डाल देता है। वास्तव में, परीक्षार्थी स्वयं इस तथ्य से परिचित होता है; उसे इसकी पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि भरोसे की ज़रूरत होती है।
परीक्षा के समय समाज और परिवार को कुछ समय के लिए स्वयं परीक्षार्थी बनने की आवश्यकता होती है। इसका अर्थ यह नहीं कि वे किताबें खोलकर पढ़ने लगें, बल्कि यह कि वे परीक्षार्थी की संवेदनाओं को पढ़ें। वे यह समझने का प्रयास करें कि इस समय कौन-सी बात उसे सशक्त बनाएगी और कौन-सी उसे कमजोर कर देगी।
एक सकारात्मक परीक्षा-परिवेश वही होता है जहाँ अनावश्यक हस्तक्षेप न हो। जहाँ बच्चे को अपनी दिनचर्या तय करने की स्वतंत्रता मिले। जहाँ उसकी नींद, भोजन और एकांत का सम्मान किया जाए। जहाँ उससे यह अपेक्षा न की जाए कि वह हर समय प्रसन्न दिखाई दे या हर प्रश्न का उत्तर दे।
कई बार परीक्षार्थी को परीक्षा देने के लिए रिश्तेदारों या परिचितों के यहाँ जाना पड़ता है। ऐसे में वहाँ उपस्थित लोगों का व्यवहार अत्यंत संवेदनशील होना चाहिए। जिज्ञासावश पूछे गए प्रश्न—“तैयारी कैसी है?”, “इस बार कितने प्रतिशत आएँगे?”—अक्सर मन पर अनावश्यक दबाव बना देते हैं। उस समय सबसे बड़ा सहयोग यह होता है कि परीक्षार्थी को सामान्य, सहज और स्वाभाविक वातावरण दिया जाए।
यह भी देखा गया है कि कई अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी केवल इसलिए अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाते क्योंकि परीक्षा के दौरान उनका पारिवारिक या सामाजिक परिवेश असंतुलित रहा। विषय की समझ और परिश्रम के बावजूद, मन की अस्थिरता उनकी क्षमता को सीमित कर देती है। यह एक गंभीर सामाजिक प्रश्न है, जिस पर सामूहिक चिंतन आवश्यक है।
परीक्षा के समय जीवन की अन्य समस्याओं को परीक्षार्थी से यथासंभव दूर रखना चाहिए। जीवन में समस्याएँ हमेशा रहेंगी—यह जीवन का स्वभाव है। पर परीक्षा के कुछ सप्ताह ऐसे होते हैं, जब समाज और परिवार को यह जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि वे उन समस्याओं का भार परीक्षार्थी के कंधों पर न डालें।
एक संतुलित परिवार वही है जो परीक्षा के समय विवादों को स्थगित करना जानता है। जहाँ यह समझ हो कि अभी प्राथमिकता क्या है। जहाँ सहयोग शब्दों से नहीं, व्यवहार से दिखाई दे।
समाज की भूमिका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। शिक्षक, पड़ोसी, रिश्तेदार, मित्र—सभी को यह समझना चाहिए कि उनका एक छोटा सा वाक्य भी परीक्षार्थी के मन पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। सकारात्मक ऊर्जा वही नहीं होती जो ऊँचे स्वर में प्रेरणा देती है, बल्कि वह भी होती है जो मौन में सुरक्षा का एहसास कराती है।
परीक्षा के दौरान समाज को एक सामूहिक सकारात्मक वातावरण का निर्माण करना चाहिए—जहाँ तुलना न हो, उपहास न हो, डर न हो। जहाँ सफलता को सम्मान मिले और असफलता को स्वीकार्यता।
यह भी आवश्यक है कि परीक्षार्थी को यह महसूस कराया जाए कि उसका मूल्य केवल परीक्षा परिणाम से निर्धारित नहीं होता। परीक्षा जीवन का एक चरण है, सम्पूर्ण जीवन नहीं। यह भाव यदि ईमानदारी से व्यवहार में उतारा जाए, तो परीक्षार्थी का आत्मविश्वास स्वतः सुदृढ़ होता है।
परीक्षा के समय परिवार और समाज का दायित्व केवल समर्थन देना नहीं, बल्कि सही समय पर चुप रहना भी है। यह मौन कई बार सबसे बड़ा सहयोग बन जाता है।
यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि हमारे बच्चे सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करें, तो हमें उनके लिए एक ऐसा वातावरण बनाना होगा जहाँ वे स्वयं को बोझ नहीं, बल्कि भरोसे से घिरा हुआ महसूस करें।
अंततः परीक्षा एक व्यक्तिगत प्रयास है, पर उसकी सफलता सामूहिक संवेदनशीलता पर निर्भर करती है। जिस दिन समाज और परिवार यह समझ लेंगे कि परीक्षा के समय उन्हें भी परीक्षार्थी बनना है—उस दिन न केवल परिणाम बेहतर होंगे, बल्कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अधिक मानवीय और संवेदनशील बन सकेगी।
लेखक
डॉ० सदानन्द गुप्ता अपर जिलाधिकारी (वित्त एवं राजस्व) वाराणसी