New Delhi: वरिष्ठ पत्रकार पीयूष बेबले ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की किताब को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट के जरिए उन्होंने उन किताबों का जिक्र किया है, जिन्हें सत्ता के लिए असहज माने जाने पर कथित तौर पर दबा दिया जाता है।
बेबले ने इस संदर्भ में महात्मा गांधी और मुंशी प्रेमचंद की कृतियों का ऐतिहासिक उदाहरण भी दिया है। बेबले का यह पोस्ट ऐसे समय में आया है जब जनरल नरवणे की किताब के कुछ अंशों को लेकर चर्चा जारी है, लेकिन किताब अभी तक बाजार में व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं हुई है।
ऐतिहासिक प्रतिबंधों का दिया हवाला
पीयूष बेबले ने अपने पोस्ट में लिखा कि जो किताबें सत्ता की पोल खोलती हैं, सरकारें उन्हें प्रतिबंधित कर देती हैं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में किताबें छपने के बावजूद उन्हें वितरित नहीं होने दिया जाता।

“जो किताबें सत्ता को बेनक़ाब करती हैं, उन्हें सरकारें बैन कर देती हैं और आज के समय में छपने के बावजूद वितरित नहीं होने देतीं।” — पीयूष बेबले
उन्होंने याद दिलाया कि ब्रिटिश सरकार ने महात्मा गांधी की प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसी तरह, मुंशी प्रेमचंद के कहानी संग्रह ‘सोजे वतन’ को न केवल प्रतिबंधित किया गया, बल्कि प्रेमचंद को अपनी ही किताबें जलाने पर मजबूर किया गया था।
क्या नरवणे दबाव में झुक जाएंगे?
इन ऐतिहासिक घटनाओं का जिक्र करते हुए बेबले ने जनरल नरवणे की किताब के मौजूदा हालात पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने लिखा, “जनरल नरवणे की किताब भी उसी श्रृंखला में आगे बढ़ रही है।”
