भोपाल। मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (MPSIDC) से जुड़े 137 करोड़ रुपए के कथित भूमि घोटाले में लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठे हैं। FIR में आरोपी बनाए गए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी मोहम्मद सुलेमान समेत तीन अफसरों के नाम कोर्ट में पेश किए गए आरोप पत्र से हटाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है। लोकायुक्त पुलिस के इस फैसले के खिलाफ भोपाल की विशेष अदालत में एक याचिका दायर की गई है।
यह याचिका ग्वालियर निवासी रामसेवक शर्मा की ओर से वकील विभोर खंडेलवाल ने दायर की है। याचिका में कहा गया है कि लोकायुक्त पुलिस को किसी भी आरोपी को क्लीन चिट देने का अधिकार नहीं है, यह अधिकार सिर्फ अदालत के पास है। जांच एजेंसी का काम सिर्फ सबूत इकट्ठा कर कोर्ट के सामने पेश करना होता है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला ग्वालियर के रंगावान गांव की 28.52 हेक्टेयर सरकारी जमीन से जुड़ा है, जो MPSIDC को दी गई थी। आरोप है कि निगम के अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर यह बेशकीमती जमीन अवैध रूप से एक निजी कंपनी को आवंटित कर दी, जिससे शासन को करीब 137 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। यह घोटाला उस समय हुआ जब मोहम्मद सुलेमान MPSIDC के प्रबंध निदेशक (MD) थे।
शिकायत के बाद लोकायुक्त पुलिस ने जांच शुरू की और मामले में 10 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की थी। इनमें तत्कालीन एमडी मोहम्मद सुलेमान, तत्कालीन डिप्टी जनरल मैनेजर राजेश मेहर और ग्वालियर के तत्कालीन एसडीएम विनोद शर्मा का नाम भी शामिल था।
FIR में थे नाम, चालान से हो गए गायब
लंबी जांच के बाद लोकायुक्त पुलिस ने 7 मार्च, 2024 को विशेष अदालत में इस मामले का आरोप पत्र (चालान) पेश किया। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि चालान में से मोहम्मद सुलेमान, राजेश मेहर और विनोद शर्मा के नाम हटा दिए गए थे। लोकायुक्त पुलिस ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में इन तीनों अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी थी। इसी क्लीन चिट को अब कोर्ट में चुनौती दी गई है।
याचिका में दी गई ये दलीलें
याचिकाकर्ता ने अपनी अर्जी में तर्क दिया है कि किसी भी आपराधिक मामले में आरोपी को आरोपमुक्त करने का अधिकार सिर्फ अदालत के पास होता है। जांच एजेंसी का काम केवल तथ्यों और सबूतों को अदालत के समक्ष रखना है। याचिका के अनुसार, लोकायुक्त पुलिस ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर तीनों अधिकारियों को क्लीन चिट दी है, जो कानूनी रूप से सही नहीं है। अदालत से मांग की गई है कि लोकायुक्त के इस फैसले को रद्द किया जाए और तीनों अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की अनुमति दी जाए। इस याचिका के बाद अब मामले की सुनवाई विशेष अदालत में होगी, जहां यह तय किया जाएगा कि इन अधिकारियों को मिली क्लीन चिट बरकरार रहेगी या नहीं।