लोकसभा में विपक्षी दलों ने स्पीकर ओम बिड़ला को हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव लाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की अध्यक्षता में हुई इंडिया ब्लॉक की बैठक में इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। विपक्ष का आरोप है कि सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता का पालन नहीं किया गया और विपक्ष की आवाज को बार-बार दबाया गया।
विरोध की वजहें क्या हैं?
विपक्षी दलों का कहना है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को बोलने का अवसर नहीं दिया गया। इसके अलावा बजट सत्र के पहले सप्ताह में कांग्रेस के सात सांसदों समेत कुल आठ विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया, जिसे विपक्ष अनुचित और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई बता रहा है। हाल के दिनों में सदन की कार्यवाही कई बार स्थगित हुई, वहीं विपक्षी सांसदों ने सरकार से 2020 के भारत-चीन संघर्ष को लेकर जवाब मांगा था। यह मांग पूर्व सेना प्रमुख एम.एम. नरवणे के अप्रकाशित संस्मरणों के कुछ अंश सामने आने के बाद तेज हुई।
किस संवैधानिक प्रावधान के तहत आएगा प्रस्ताव?
सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि यह प्रस्ताव भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 के तहत लाया जाएगा। विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने धन्यवाद प्रस्ताव पर विपक्ष के नेता को बोलने से रोका, भाजपा सांसद निशिकांत दुबे के खिलाफ कोई कार्रवाई शुरू नहीं की और कांग्रेस की महिला सांसदों पर लगाए गए आरोपों पर भी निष्पक्ष कदम नहीं उठाए। इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाकर अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देने की तैयारी की जा रही है।
लोकसभा स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 में लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख है। इसके तहत स्पीकर को केवल सदन में पारित विशेष प्रस्ताव के जरिए ही हटाया जा सकता है। इसके लिए प्रस्ताव की सूचना कम से कम 14 दिन पहले देनी होती है। इस नोटिस पर लोकसभा के कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर अनिवार्य होते हैं। यदि यह न्यूनतम समर्थन नहीं मिलता, तो प्रस्ताव स्वीकार ही नहीं किया जाता।
चर्चा और मतदान का तरीका
नोटिस स्वीकार होने के बाद स्पीकर को इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए एक तारीख तय करनी होती है, जो अधिकतम 10 दिनों के भीतर रखी जाती है। चर्चा के दौरान मतदान होता है और यदि लोकसभा में मौजूद तथा मतदान करने वाले सांसदों का साधारण बहुमत प्रस्ताव के पक्ष में होता है, तो स्पीकर को पद से हटाया जा सकता है। इस प्रक्रिया में संविधान संशोधन की तरह दो-तिहाई बहुमत की जरूरत नहीं होती, बल्कि साधारण बहुमत ही पर्याप्त माना जाता है।
क्या स्पीकर चर्चा की अध्यक्षता करेंगे?
जब लोकसभा स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा होती है, उस दिन स्पीकर स्वयं सदन की अध्यक्षता नहीं करते। इस दौरान डिप्टी स्पीकर या कोई अन्य नामित सदस्य कार्यवाही का संचालन करता है, ताकि प्रक्रिया निष्पक्ष बनी रहे।
प्रस्ताव पास होने के बाद क्या होता है?
यदि अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाता है, तो स्पीकर को तुरंत अपने पद से हटना पड़ता है। हालांकि वे लोकसभा के सदस्य बने रहते हैं, लेकिन स्पीकर के रूप में उनकी भूमिका समाप्त हो जाती है। इसके बाद लोकसभा में नए स्पीकर के चुनाव की प्रक्रिया शुरू होती है। गौर करने वाली बात यह है कि अब तक के संसदीय इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है, जब लोकसभा स्पीकर को इस तरह हटाया गया हो।