सीएम डॉ. मोहन यादव ने स्व. राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के योगदान को किया याद, संसदीय परंपराओं और जनजागरण में भूमिका को सराहा

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मीडिया से बातचीत के दौरान स्वर्गीय राजेंद्र प्रसाद शुक्ला के योगदान को याद करते हुए उनके सार्वजनिक जीवन पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि 10 फरवरी 1930 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में जन्मे श्री शुक्ला ने राजनीति और संसदीय परंपराओं को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे वर्ष 1985 से 1990 तक मध्यप्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष रहे और इस दौरान सदन की कार्यवाही को गरिमा और अनुशासन के साथ संचालित किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री शुक्ला केवल एक जनप्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि जन-जागरण के वाहक भी थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ क्षेत्र में पदयात्राओं के माध्यम से लोगों के बीच जाकर सामाजिक और राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया। वे राज्य सरकार में विधि-विधायी एवं सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री भी रहे और प्रशासनिक कार्यशैली में पारदर्शिता व सुशासन पर बल दिया।

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद श्री शुक्ला को नवगठित विधानसभा का प्रथम अध्यक्ष बनने का अवसर मिला। उन्होंने 14 दिसंबर 2000 से 19 दिसंबर 2003 तक इस दायित्व का निर्वहन करते हुए संसदीय परंपराओं की मजबूत नींव रखी। उनकी कार्यशैली को आज भी संसदीय गरिमा के उदाहरण के रूप में याद किया जाता है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने यह भी उल्लेख किया कि श्री शुक्ला ने ‘असंसदीय अभिव्यक्तियां’ नामक पुस्तक की संकल्पना की, जो विधायी कार्यप्रणाली को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ मानी जाती है। इसके अलावा उन्होंने संसदीय विषयों पर कई पुस्तकों की रचना की, जो जनप्रतिनिधियों और शोधार्थियों के लिए उपयोगी हैं।

इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने विधानसभा अध्यक्ष श्री नरेंद्र सिंह तोमर की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रदेश के राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष रहे महान व्यक्तित्वों की जयंती एवं पुण्यतिथि पर उन्हें विधानसभा भवन में स्मरण करने की परंपरा स्थापित करना एक सराहनीय पहल है। इसके लिए मुख्यमंत्री ने श्री तोमर के प्रति आभार भी व्यक्त किया।