“अमेरिका ने हमारा इस्तेमाल किया और टॉयलेट पेपर की तरह फेंका”: पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का बड़ा बयान

Islamabad News: पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने देश की संसद में एक ऐसा बयान दिया है जिसने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल मचा दी है। आसिफ ने अमेरिका के साथ पाकिस्तान के ऐतिहासिक रिश्तों की कड़वी सच्चाई को उजागर करते हुए कहा कि वाशिंगटन ने हमेशा पाकिस्तान को अपने हितों के लिए इस्तेमाल किया और काम निकल जाने के बाद उसे “टॉयलेट पेपर” की तरह फेंक दिया।
उन्होंने स्वीकार किया कि आतंकवाद की जिस आग में आज पाकिस्तान जल रहा है, वह उसकी अपनी ऐतिहासिक गलतियों और अमेरिकी जंग में मोहरा बनने का नतीजा है।
दो सैन्य तानाशाहों की भूल और अमेरिकी नैरेटिव
संसद को संबोधित करते हुए ख्वाजा आसिफ ने अतीत के पन्ने पलटते हुए कहा कि पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में दो बड़ी जंग लड़ीं। उन्होंने सीधे तौर पर दो सैन्य तानाशाहों—जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज मुशर्रफ—को इसका जिम्मेदार ठहराया। आसिफ के मुताबिक, इन तानाशाहों ने अपनी सत्ता को वैश्विक मान्यता दिलाने के लिए पाकिस्तान को अमेरिका के हाथों गिरवी रख दिया।
उन्होंने 1979 के सोवियत हस्तक्षेप का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय अमेरिका ने इसे ‘इस्लाम बनाम कुफ्र’ की जंग के रूप में प्रचारित किया, जबकि वह केवल अपनी भू-राजनीतिक बढ़त बनाना चाहता था। आसिफ ने अफसोस जताया कि पाकिस्तान ने मजहब के नाम पर उस जंग में हिस्सा लिया, जो असल में उसकी थी ही नहीं।
9/11 और मुशर्रफ का समझौता: “आज भी चुका रहे हैं कीमत”
रक्षा मंत्री ने साल 2001 में हुए 11 सितंबर के हमलों के बाद की स्थिति पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि परवेज मुशर्रफ के दौर में अमेरिका का साथ देने का जो फैसला लिया गया, उसकी भारी कीमत पाकिस्तान आज भी चुका रहा है। उन्होंने तर्क दिया कि अमेरिका के साथ इस ‘रणनीतिक साझेदारी’ ने पाकिस्तान के भीतर आतंकवाद के बीज बोए।
आसिफ ने साल 2000 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की संक्षिप्त पाकिस्तान यात्रा का उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका का नजरिया हमेशा से स्वार्थपूर्ण रहा है। भारत के लंबे दौरे के बाद क्लिंटन का कुछ घंटों के लिए पाकिस्तान आना यह बताने के लिए काफी था कि रिश्तों में पाकिस्तान की हैसियत क्या रह गई थी।
शिक्षा व्यवस्था में मिलाई गई ‘नफरत की घुट्टी’
एक चौंकाने वाले खुलासे में ख्वाजा आसिफ ने माना कि युद्ध को सही ठहराने और युवाओं को लड़ने के लिए प्रेरित करने के लिए पाकिस्तान के एजुकेशन सिस्टम (शिक्षा प्रणाली) में जानबूझकर बदलाव किए गए।
उन्होंने कहा कि पाठ्यक्रम में कट्टरता और जंग के नैरेटिव को शामिल किया गया, जिसके दुष्प्रभाव आज भी समाज और सिस्टम में मौजूद हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक पाकिस्तान अपनी इन गलतियों को स्वीकार नहीं करेगा, वह आतंकवाद के चंगुल से बाहर नहीं निकल पाएगा।
शिया मस्जिद पर हमला और आंतरिक कलह
यह कड़ा बयान इस्लामाबाद की एक शिया मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले की निंदा के दौरान आया। 6 फरवरी को हुए इस भीषण हमले में 31 लोगों की मौत हो गई थी। आसिफ ने इस बात पर दुख जताया कि देश आतंकवाद जैसे गंभीर मुद्दे पर भी राजनीतिक रूप से बंटा हुआ है। उन्होंने विपक्ष और अन्य नेताओं की आलोचना की जो राजनीतिक मतभेदों के कारण पीड़ितों के अंतिम संस्कार तक में शामिल नहीं हुए।
अमेरिका का बदलता रुख: “भारत की कीमत पर पाकिस्तान नहीं”
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का यह गुस्सा ऐसे समय में फूटा है जब अमेरिका के नए विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत के पक्ष में बड़ा बयान दिया है। रुबियो ने स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका, पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग बढ़ाना चाहता है, लेकिन वह भारत के साथ अपने मजबूत रिश्तों की कीमत पर ऐसा नहीं करेगा।
अमेरिकी प्रशासन के इस रुख ने पाकिस्तान को यह एहसास दिला दिया है कि दक्षिण एशिया में अब भारत ही अमेरिका का प्राथमिक और विश्वसनीय साझेदार है। रुबियो के बयान ने यह भी साफ कर दिया कि भारतीय कूटनीति इतनी परिपक्व है कि उसे अमेरिका-पाकिस्तान के सीमित सहयोग से कोई आपत्ति नहीं है।
निष्कर्ष: इतिहास से सबक लेने की चुनौती
ख्वाजा आसिफ का यह भाषण आत्ममंथन की एक पुकार है। उन्होंने स्वीकार किया कि पाकिस्तान कभी रूस, कभी ब्रिटेन तो कभी अमेरिका की गोद में बैठकर छोटे फायदे तलाशता रहा और आज हालत यह है कि इन बाहरी ताकतों का दखल पाकिस्तान में 40 साल पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ गया है।
पाकिस्तान के लिए अब चुनौती यह है कि वह अपनी बाहरी निर्भरता को कम करे और अपनी धरती पर पल रहे आतंकवाद के खात्मे के लिए कोई ठोस राष्ट्रीय नीति बनाए।