मनोरंजन और जानकारी के सीमित साधनों के दौर में रेडियो लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। घर-घर में रखे रेडियो सेट से समाचार, नाटक, कविताएं और खास तौर पर हिंदी फिल्मों के गीत सुने जाते थे। रेडियो ने ही फिल्मी संगीत को जन-जन तक पहुँचाया और श्रोताओं की पसंद को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव में बदल दिया। उस समय रेडियो सुनना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवार के साथ बिताया जाने वाला सामूहिक समय भी था।
इस लोकप्रियता को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाने में बिनाका गीत माला का विशेष योगदान रहा, जो रेडियो सिलोन से प्रसारित होता था। इस कार्यक्रम के दीवाने देशभर में थे, और लोग बेसब्री से साप्ताहिक गीतों की रैंकिंग सुनने का इंतज़ार करते थे। इसने फिल्मी गीतों को घर-घर तक पहुँचाकर उन्हें यादगार बना दिया और रेडियो को जनमानस की धड़कन बना दिया।
रेडियो के इतिहास में एक बड़ा नाम गूगलिएल्मो मार्कोनी का है, जिन्होंने 1895 में रेडियो का आविष्कार किया। 1896 में उन्होंने इसका पेटेंट प्राप्त किया और वायरलेस संचार की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। उनके इस अद्भुत योगदान के लिए 1909 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मार्कोनी के आविष्कार ने संचार के क्षेत्र में एक नई दिशा दी, जिसने आगे चलकर प्रसारण माध्यमों को जन्म दिया।
समय के साथ तकनीक बदली और पारंपरिक रेडियो की जगह एफएम रेडियो ने ले ली। एफएम प्रसारण ने ध्वनि की गुणवत्ता, प्रस्तुति शैली और कार्यक्रमों की विविधता में बड़ा बदलाव किया। अब श्रोता केवल गीत ही नहीं, बल्कि लाइव बातचीत, इंटरैक्टिव शो, ट्रैफिक अपडेट, और शहर-विशेष कार्यक्रमों का आनंद लेने लगे। इस बदलाव ने रेडियो को आधुनिक पीढ़ी के लिए भी आकर्षक बना दिया और इसे एक नई पहचान दी।
रेडियो के महत्व को वैश्विक स्तर पर मान्यता देते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2011 में हर वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने का प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद से यह दिन दुनिया भर में रेडियो के योगदान को सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। इस दिवस का उद्देश्य रेडियो को सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के सशक्त माध्यम के रूप में जन-जन तक पहुँचाने के महत्व को रेखांकित करना है, ताकि यह माध्यम आने वाली पीढ़ियों तक भी प्रभावी बना रहे।