मध्य प्रदेश के म्हाऊ से बलवाड़ा तक प्रस्तावित नई रेल लाइन परियोजना पर्यावरण के लिहाज से बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है। इस रेल लाइन के निर्माण के लिए लगभग 1 लाख पेड़ों की कटाई की जरूरत होगी। यह परियोजना मध्य प्रदेश को तेलंगाना राज्य से सीधी रेल कनेक्टिविटी देने के उद्देश्य से बनाई गई है।
परियोजना का महत्व
म्हाऊ-बलवाड़ा रेल लाइन रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस रेल मार्ग के बनने से मध्य प्रदेश के इंदौर क्षेत्र से दक्षिण भारत तक की यात्रा काफी आसान हो जाएगी। तेलंगाना के साथ सीधी रेल कनेक्टिविटी से व्यापार और यातायात को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
पर्यावरणीय चिंता
इस परियोजना के लिए करीब 1 लाख पेड़ों की कटाई सबसे बड़ा विवादित मुद्दा है। रेल लाइन का मार्ग वनक्षेत्र से होकर गुजरता है। पर्यावरणविदों ने इसे लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान होगा।
वन विभाग और रेलवे के बीच इस मामले पर बातचीत जारी है। वनभूमि के उपयोग के लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से मंजूरी लेना अनिवार्य होगा। वन अधिकारियों के अनुसार प्रतिपूरक वनीकरण योजना भी तैयार की जाएगी।
रेल मार्ग का विवरण
प्रस्तावित रेल लाइन म्हाऊ से शुरू होकर बलवाड़ा तक जाएगी। यह मार्ग कई जिलों से होकर गुजरेगा। रेलवे ने इस परियोजना का सर्वेक्षण पहले ही पूरा कर लिया है। इसमें कई सुरंगों और पुलों का निर्माण भी शामिल होगा क्योंकि यह क्षेत्र पहाड़ी और जंगली इलाके से गुजरता है।
स्थानीय प्रतिक्रिया
स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासी समुदायों ने भी अपनी चिंता व्यक्त की है। कई गांवों की जमीन इस परियोजना में आ सकती है। भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास को लेकर ग्रामीणों में अनिश्चितता बनी हुई है। हालांकि कुछ स्थानीय लोग रेल कनेक्टिविटी से रोजगार और विकास की उम्मीद भी रखते हैं।
सरकार की भूमिका
मध्य प्रदेश सरकार ने इस परियोजना को प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में शामिल किया है। राज्य सरकार रेलवे के साथ मिलकर भूमि अधिग्रहण और वन मंजूरी की प्रक्रिया में सहयोग कर रही है। केंद्र सरकार से भी इस परियोजना के लिए बजटीय सहायता की मांग की गई है।
पर्यावरण मंजूरी मिलने के बाद ही निर्माण कार्य शुरू हो सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाना इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती होगी। रेलवे को प्रतिपूरक वनीकरण के तहत कटे हुए पेड़ों से कई गुना अधिक पेड़ लगाने होंगे।
यह परियोजना पूरी होने पर मध्य प्रदेश के औद्योगिक विकास और दक्षिण भारत से कनेक्टिविटी में नया अध्याय जुड़ेगा। लेकिन इसके लिए पर्यावरणीय कीमत भी चुकानी होगी।