मध्य प्रदेश के मंदसौर शहर में स्थित पशुपतिनाथ महादेव मंदिर भारत के प्राचीनतम शिव मंदिरों में गिना जाता है। महाशिवरात्रि 2026 के अवसर पर यह मंदिर एक बार फिर चर्चा में है। यहां स्थापित अष्टमुखी पशुपतिनाथ प्रतिमा को नेपाल के विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर की प्रतिमा से भी विशिष्ट माना जाता है।
5वीं-6ठी शताब्दी की प्राचीन प्रतिमा
शिलालेखों और पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार मंदसौर के इस मंदिर की मूर्ति लगभग 5वीं या 6ठी शताब्दी ईस्वी की है। यह समयकाल गुप्तकालीन और उत्तर गुप्तकालीन कला परंपरा का स्वर्णिम दौर था। उस काल में निर्मित मूर्तिकला के श्रेष्ठ नमूनों में इस प्रतिमा की गणना होती है।
इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता इसका अष्टमुखी स्वरूप है। भगवान शिव की आठ मुखों वाली प्रतिमा अत्यंत दुर्लभ है। नेपाल के काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर में पंचमुखी शिवलिंग प्रतिष्ठित है, जबकि मंदसौर की प्रतिमा में आठ मुख हैं। यही कारण है कि विद्वान और शैव परंपरा के जानकार इसे विशिष्ट मानते हैं।
शैव धर्म की पशुपतिनाथ परंपरा
यह मंदिर पशुपतिनाथ परंपरा से संबंधित है। शैव धर्म के भीतर कुल छह प्रमुख परंपराएं मानी जाती हैं। पशुपतिनाथ परंपरा इनमें से एक महत्वपूर्ण धारा है। इस परंपरा में भगवान शिव को समस्त प्राणियों के स्वामी यानी ‘पशुपति’ के रूप में पूजा जाता है।
शैव दर्शन में ‘पशु’ शब्द का अर्थ केवल पशु नहीं बल्कि समस्त जीवात्माएं हैं। भगवान शिव इन सभी जीवों के नाथ यानी स्वामी हैं। इसी अवधारणा पर पशुपतिनाथ संप्रदाय आधारित है।
मंदसौर का ऐतिहासिक महत्व
मंदसौर प्राचीन काल में ‘दशपुर’ के नाम से जाना जाता था। यह नगर मालवा क्षेत्र का प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र रहा है। यहां अनेक प्राचीन शिलालेख और मंदिर मिले हैं जो इस नगर की समृद्ध धार्मिक विरासत की गवाही देते हैं।
दशपुर के शिलालेखों में रेशम बुनकरों द्वारा सूर्य मंदिर के निर्माण और जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है। इसी तरह पशुपतिनाथ मंदिर भी इस क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक परंपरा का साक्षी है।
नेपाल और मंदसौर: तुलनात्मक दृष्टि
नेपाल का पशुपतिनाथ मंदिर यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। वह हिंदुओं के सबसे पवित्र तीर्थस्थलों में से एक है। वहां की पंचमुखी शिवलिंग प्रतिमा विश्वभर में प्रसिद्ध है। लेकिन मंदसौर की अष्टमुखी प्रतिमा अपनी अनूठी संरचना के कारण अलग पहचान रखती है।
विशेषज्ञों के अनुसार आठ मुखों वाली शिव प्रतिमा शिव के अष्ट स्वरूपों का प्रतीक है। इसमें भगवान शिव के विभिन्न रूपों और शक्तियों का समावेश है। ऐसी प्रतिमा भारत में अत्यंत दुर्लभ है।
महाशिवरात्रि पर विशेष आकर्षण
महाशिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ उमड़ती है। देश के विभिन्न हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आते हैं। प्राचीन प्रतिमा के दर्शन और पूजन का विशेष महत्व माना जाता है।
स्थानीय प्रशासन और मंदिर समिति महाशिवरात्रि पर विशेष व्यवस्थाएं करती है। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और विशेष अभिषेक का आयोजन किया जाता है।
पुरातात्विक और सांस्कृतिक धरोहर
मंदसौर का पशुपतिनाथ मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं बल्कि भारत की पुरातात्विक धरोहर भी है। 5वीं-6ठी शताब्दी की यह प्रतिमा उस काल की मूर्तिकला और शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे संरक्षित करना राष्ट्रीय महत्व का विषय है।
पुरातत्वविदों का मानना है कि इस मंदिर और प्रतिमा पर और अधिक शोध की आवश्यकता है। इससे शैव परंपरा के विकास और मध्य भारत में इसके प्रसार को समझने में सहायता मिल सकती है।