रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) ढांचे में बदलाव का मसौदा जारी किया है। इस ड्राफ्ट में सबसे बड़ा प्रस्ताव कर्ज चुकाने की समयसीमा बढ़ाकर 6 साल तक करने का है।
साथ ही खेती से जुड़े आधुनिक तकनीकी खर्चों को भी क्रेडिट के दायरे में लाने की बात कही गई है। RBI ने इस मसौदे पर 6 मार्च 2026 तक आम लोगों, बैंकों और अन्य हितधारकों से सुझाव मांगे हैं।
प्रस्तावित गाइडलाइंस लागू होने पर कमर्शियल बैंक, स्मॉल फाइनेंस बैंक, रीजनल रूरल बैंक और रूरल को-ऑपरेटिव बैंक सभी पर समान नियम लागू होंगे। RBI का फोकस यह है कि अलग-अलग बैंकों में KCC संचालन के तरीके में जो अंतर है, उसे कम किया जाए और किसानों को जरूरत के अनुसार स्पष्ट, समयबद्ध और पर्याप्त कर्ज मिल सके।
KCC योजना का मूल उद्देश्य किसानों को समय पर और अपेक्षाकृत सस्ती दर पर ऋण उपलब्ध कराना रहा है। इस सुविधा के जरिए किसान खेती की लागत, कटाई के बाद का खर्च, उत्पाद की मार्केटिंग, घरेलू जरूरतें, फार्म एसेट्स की देखरेख और संबद्ध गतिविधियों के लिए वित्त ले सकते हैं। इससे अनौपचारिक और महंगे कर्ज पर निर्भरता घटाने की कोशिश होती है।
RBI ने मसौदे में यह भी रेखांकित किया है कि खेती के स्वरूप में बदलाव के साथ क्रेडिट ढांचा भी बदले। अब कई किसान मौसम डेटा, मिट्टी की जांच और प्रमाणन आधारित खेती की तरफ बढ़ रहे हैं। ऐसे में क्रेडिट नीति सिर्फ पारंपरिक इनपुट तक सीमित रहे, तो किसान की वास्तविक जरूरत पूरी नहीं होती। इसी अंतर को भरने के लिए अतिरिक्त प्रावधानों का दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है।
फसल चक्र और पुनर्भुगतान पर नए प्रस्ताव
ड्राफ्ट के अनुसार फसल सीजन को मानकीकृत करने का प्रस्ताव है। कम अवधि वाली फसलों के लिए 12 महीने का चक्र और लंबी अवधि वाली फसलों के लिए 18 महीने का चक्र तय करने की बात कही गई है। अभी कई जगह यह अवधि बैंक-वार अलग रहती है, जिससे मंजूरी और अदायगी शेड्यूल में असमानता आती है।
इसके साथ KCC लोन की अदायगी अवधि 6 साल तक बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया है। यह बदलाव खासकर लंबी अवधि वाली फसलों के लिए उपयोगी माना जा रहा है, जहां रिटर्न आने में समय लगता है। अवधि बढ़ने से किस्तों का दबाव अपेक्षाकृत संतुलित हो सकता है और नकदी प्रवाह के हिसाब से भुगतान करना आसान होगा।
RBI ने ड्रॉइंग लिमिट को भी फसल सीजन के स्केल ऑफ फाइनेंस से जोड़ने की बात कही है। स्केल ऑफ फाइनेंस खेती की वास्तविक लागत का आकलन होता है। जब क्रेडिट लिमिट इसी आधार पर तय होगी तो किसानों को लागत के अनुरूप कर्ज मिल पाएगा और बीच सीजन फंड की कमी की स्थिति कम हो सकती है।
20% अतिरिक्त प्रावधान में तकनीकी खर्च शामिल
मौजूदा ढांचे में फार्म एसेट्स की मरम्मत और रखरखाव के लिए 20% अतिरिक्त प्रावधान रखा जाता है। RBI के मसौदे में इस प्रावधान के भीतर आधुनिक तकनीक से जुड़े खर्चों को स्पष्ट रूप से शामिल करने का प्रस्ताव है। इसका मतलब यह है कि कर्ज का उपयोग सिर्फ पारंपरिक मदों तक सीमित नहीं रहेगा।
मसौदे में जिन खर्चों को पात्र बताया गया है, उनमें मिट्टी की टेस्टिंग, रियल-टाइम वेदर फोरकास्ट और ऑर्गेनिक फार्मिंग या गुड एग्रीकल्चरल प्रैक्टिसेज (GAP) से जुड़े सर्टिफिकेशन शामिल हैं। इससे किसान वैज्ञानिक सलाह के साथ खेती योजना बना सकेंगे और बाजार उन्मुख उत्पादन के लिए जरूरी प्रमाणन पर भी खर्च कर पाएंगे।
नीति विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी जांच और मौसम आधारित निर्णय अब उत्पादन प्रबंधन का केंद्रीय हिस्सा बनते जा रहे हैं। यदि इन खर्चों को औपचारिक क्रेडिट में जगह मिलती है, तो छोटे और सीमांत किसान भी ऐसे टूल्स तक पहुंच बना सकते हैं। यह बदलाव खेती के जोखिम प्रबंधन और लागत नियंत्रण दोनों में भूमिका निभा सकता है।
किसानों के लिए संभावित असर
प्रस्तावित संशोधनों का पहला असर ऋण अदायगी ढांचे पर दिखेगा। 6 साल तक की समयसीमा से लंबी अवधि की फसलों और संबद्ध गतिविधियों में नकदी चक्र के अनुरूप भुगतान संभव हो सकता है। दूसरा असर क्रेडिट की मात्रा पर होगा, क्योंकि लिमिट को वास्तविक लागत संकेतक से जोड़ा जा रहा है।
तीसरा असर आधुनिक खेती की स्वीकार्यता पर पड़ सकता है। जब मिट्टी परीक्षण, मौसम पूर्वानुमान और प्रमाणन जैसे खर्च भी वित्तपोषण योग्य होंगे, तो किसान इन सेवाओं को वैकल्पिक नहीं बल्कि नियमित इनपुट के रूप में लेने लगेंगे। इससे उत्पादन योजना और गुणवत्ता मानकों पर बेहतर काम की संभावना बनेगी।
RBI ने मसौदा सार्वजनिक करने के साथ यह स्पष्ट किया है कि अंतिम दिशा-निर्देश सुझावों की समीक्षा के बाद जारी होंगे। यानी अभी ये प्रस्तावित प्रावधान हैं, अंतिम नियम नहीं। किसानों, बैंकिंग संस्थाओं और संबंधित संगठनों से मिली राय के आधार पर धाराओं में संशोधन संभव है।
पृष्ठभूमि: 2019 में दायरा बढ़ा था
KCC योजना में इससे पहले 2019 में बड़ा विस्तार किया गया था। तब इसे एनिमल हस्बेंड्री, डेयरी और फिशरीज गतिविधियों तक बढ़ाया गया था। मौजूदा मसौदा उसी क्रम की अगली कड़ी माना जा रहा है, जिसमें खेती और संबद्ध क्षेत्रों की बदलती जरूरतों के हिसाब से क्रेडिट ढांचे को अपडेट करने की कोशिश की जा रही है।
पहले कई बैंक फसल सीजन और पुनर्भुगतान व्यवस्था को अपने तरीके से तय करते थे। इससे किसानों को शर्तें समझने और तुलना करने में दिक्कत आती थी। तकनीकी खर्चों के लिए अलग से स्पष्ट कवरेज भी नहीं था। नए मसौदे का उद्देश्य इन अंतरालों को कम करना और KCC को अधिक उपयोगी बनाना है।
सुझाव देने की समयसीमा और तरीका
RBI ने रेगुलेटेड एंटिटीज, आम नागरिकों और अन्य स्टेकहोल्डर्स से 6 मार्च 2026 तक फीडबैक मांगा है। इच्छुक व्यक्ति अपनी राय RBI की वेबसाइट या ईमेल के माध्यम से भेज सकते हैं। समीक्षा पूरी होने के बाद अंतिम गाइडलाइंस जारी की जाएंगी, जिनके आधार पर बैंकों में संशोधित KCC संचालन लागू होगा।