इंदौर के लिए राजवाड़ा सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत भर नहीं, बल्कि शहर की धड़कन है। सालों से हमने यहाँ की उन संकरी गलियों, बेतरतीब खड़े वाहनों और सड़कों को निगलते अतिक्रमण को देखा है। लेकिन आज जब मैं एक यातायात प्रहरी के रूप में इस बदली हुई तस्वीर को देखता हूँ, तो सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
सलीके से खड़ी गाड़ियाँ, अतिक्रमण मुक्त चौड़ी सड़कें और राजवाड़ा का यह निखरा हुआ स्वरूप। वाकई, ‘चकाचक’ शब्द आज यहाँ चरितार्थ हो रहा है। यह दृश्य जितना सुखद है, उतना ही यह हमें एक गहरे आत्ममंथन के लिए प्रेरित भी करता है।
अक्सर हम इंदौरियों की यह आदत रही है कि हम तब तक लाइन में नहीं आते, जब तक पुलिस का डंडा या चालान का डर न हो। लेकिन क्या एक सभ्य समाज के तौर पर हमारी नैतिकता सिर्फ जुर्माने की रसीद तक ही सीमित रहनी चाहिए।
प्रशासन बनाम जनभागीदारी
नगर निगम और पुलिस प्रशासन ने अपनी पूरी ताकत झोंक कर राजवाड़ा को यह नया रूप दिया है। यह तस्वीर गवाह है कि अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो, तो व्यवस्था को पटरी पर लाया जा सकता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह व्यवस्था पुलिस-प्रशासन की सख्ती के बगैर भी कायम रहेगी।
क्या अपन इंदौरी बिना किसी ‘वर्दी’ को देखे अपनी गाड़ी पार्किंग स्टैंड में खड़ी करेंगे। क्या हमारे व्यापारी भाई सड़क को अपनी दुकानों की हद का हिस्सा नहीं मानेंगे।
सलीका हमारा, शान हमारी
इंदौर ने सफाई में नंबर 1 का ख़िताब इसलिए जीता क्योंकि यहाँ के नागरिकों ने डस्ट-बिन के उपयोग को अपनी आदत बना लिया। ठीक उसी तरह, यातायात का अनुशासन भी हमारी आदत का हिस्सा होना चाहिए। राजवाड़ा की यह खूबसूरती हमारी अपनी आन, बान और शान है। अगर सड़कें खुली होंगी, तो व्यापार भी बढ़ेगा और पर्यटन भी।
तो भिया, डंडे के डर से तो पशु भी सीधे चलते हैं, पर इंसान वो है जो अपनी जिम्मेदारी को समझे। आइए, इस अनुशासन को अपनी दिनचर्या बनाएं। संकल्प लें कि हम राजवाड़ा को दोबारा अव्यवस्था के अंधेरे में नहीं ढकेलेंगे। याद रखिये, शहर हमारा है, तो इसे संवारने का सलीका भी हमारा ही होना चाहिए।
सोचियेगा जरूर, क्योंकि इंदौर सिर्फ जगह नहीं, एक जज्बा है!
लेखक: राजकुमार जैन, यातायात प्रहरी