MP विधानसभा में जमकर हंगामा: कांग्रेस विधायक ने विजयवर्गीय को बताया कुत्तों का प्रभारी

Bhopal News: मध्य प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में इस बार आवारा कुत्तों का मुद्दा प्रमुख रूप से उठा। कांग्रेस विधायक आतिफ अकील ने कुत्तों की बढ़ती संख्या और लोगों को काटने की घटनाओं पर सवाल उठाए।
इसके जवाब में नगरीय विकास विभाग की ओर से बताया गया कि भोपाल नगर निगम क्षेत्र में एनिमल बर्थ कंट्रोल एंड डॉग कंट्रोल रूल्स 2023 के तहत बिना नसबंदी वाले कुत्तों को डार्क स्पॉट टीम पकड़कर नसबंदी केंद्र भेजती है। ऑपरेशन के बाद उन्हें उसी इलाके में छोड़ा जाता है।
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि कुत्तों की आबादी तेज गति से बढ़ती है और मौजूदा नसबंदी क्षमता अपेक्षाकृत कम है। उन्होंने कहा कि सरकार नसबंदी संख्या बढ़ाने के लिए अतिरिक्त केंद्र शुरू करने और जरूरत पड़ने पर बाहर से विशेषज्ञ बुलाने पर काम करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि समाज को भी व्यवहार और भोजन व्यवस्था पर ध्यान देना होगा।

“सदियों से श्वान हमारा साथी रहा है। आबादी बढ़ने के मुकाबले नसबंदी की संख्या कम है, इसे बढ़ाने की कोशिश करेंगे।” — कैलाश विजयवर्गीय

सदन में टिप्पणियों से बढ़ा राजनीतिक तापमान
बहस के दौरान कांग्रेस विधायक भंवर सिंह शेखावत ने टिप्पणी की कि “आज पहली बार पता चल रहा है कि कुत्तों के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय हैं।” इस पर बीजेपी विधायक उमाकांत शर्मा ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि “अब कुत्ते भी आतंकवादी हो रहे हैं” जैसी स्थिति बताई जा रही है। इन टिप्पणियों के बाद सदन का माहौल कुछ समय तक गरम रहा।
कांग्रेस विधायक आतिफ अकील ने आरोप लगाया कि कुत्तों की नसबंदी में भ्रष्टाचार हो रहा है। मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने इस टिप्पणी पर आपत्ति जताई और कहा कि ऐसे हल्के आरोप उचित नहीं हैं। इसके बाद अकील ने कहा कि सरकार चाहें तो जांच करा सकती है। इसी क्रम में राज्य मंत्री नरेंद्र शिवाजी पटेल ने कांग्रेस की घटती संख्या का जिक्र किया, जिसके बाद दोनों पक्षों में नोकझोंक बढ़ गई।
सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन और कागजी कार्रवाई पर सवाल
कांग्रेस विधायक राजन मंडलोई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का पालन जमीन पर नहीं दिख रहा। उन्होंने आरोप लगाया कि नसबंदी का काम कई जगह कागजों में दिखाया जा रहा है। मंडलोई ने अपने क्षेत्र बड़वानी का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां दो बच्चियों को कुत्तों ने काटा। उन्होंने एंटी-रेबीज इंजेक्शन की गुणवत्ता की जांच और पीड़ितों को दिए गए मुआवजे का स्पष्ट ब्यौरा सार्वजनिक करने की मांग की।
सरकार की ओर से जवाब में कहा गया कि सुझावों को दर्ज किया गया है और विभागीय स्तर पर मॉनिटरिंग मजबूत की जाएगी। विधानसभा अध्यक्ष ने भी विषय को गंभीर बताते हुए कहा कि सरकार इस मामले को प्राथमिकता से देखे।
डॉग बाइट, फूड वेस्ट और शहरी प्रबंधन पर अलग-अलग सुझाव
बीजेपी विधायक सीतासरन शर्मा ने कहा कि लोगों की मुख्य दिक्कत पालतू कुत्तों से नहीं, बल्कि आवारा कुत्तों और कुछ क्षेत्रों में डॉग लवर्स की गतिविधियों से है, जहां सार्वजनिक जगहों पर भोजन डालने से झुंड बनते हैं। बीजेपी विधायक राजेन्द्र पांडेय ने खुले में मांस और अंडा बिक्री को भी समस्या से जोड़ा। उनका कहना था कि बिखरे खाद्य अवशेष कुत्तों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
बीजेपी विधायक शैलेंद्र जैन ने कहा कि यह सिर्फ एक शहर या एक जिले का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर का सार्वजनिक स्वास्थ्य विषय बन चुका है। उन्होंने सड़ा या दूषित खाद्य पदार्थ मिलने की आशंका, एंटी-रेबीज इंजेक्शन उपलब्धता और शहरी कचरा प्रबंधन को साथ लेकर नीति बनाने की जरूरत बताई। कुछ विधायकों ने मांस-अंडा दुकानों को रिहायशी इलाकों से बाहर शिफ्ट करने का सुझाव भी रखा।

“पहली रोटी गाय को और आखिरी रोटी श्वान को देने की परंपरा भी समाज को संतुलन सिखाती है।” — कैलाश विजयवर्गीय

गोपाल भार्गव का बयान और सरकार का आधिकारिक रुख
विधायक गोपाल भार्गव ने बहस के दौरान कहा कि जब देश में बड़ी आबादी को मुफ्त राशन दिया जा रहा है, तब पालतू या आवारा श्वानों पर बड़े खर्च की सामाजिक प्राथमिकता पर भी चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कुत्तों की आबादी और नस्ल खत्म करने जैसी मांग भी रखी। यह टिप्पणी सदन में अलग से चर्चा का विषय बनी।
दिनभर चली चर्चा के बाद मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि सभी पक्षों के सुझाव नोट कर लिए गए हैं और नीति व क्रियान्वयन स्तर पर आवश्यक बिंदुओं पर काम किया जाएगा। उन्होंने दोहराया कि नसबंदी केंद्रों की संख्या बढ़ाने, संचालन क्षमता सुधारने और स्थानीय निकायों की जवाबदेही मजबूत करने पर सरकार कदम उठाएगी।
रेबीज टीके की उपलब्धता पर उठे सवालों के बीच स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र शुक्ला ने स्पष्ट किया कि प्रदेश में एंटी-रेबीज इंजेक्शन की कोई कमी नहीं है। उनके इस बयान के साथ सरकार ने संकेत दिया कि डॉग बाइट प्रबंधन, नसबंदी, टीकाकरण और शहरी सफाई को एकीकृत ढांचे में देखने की जरूरत है।
विधानसभा की बहस से यह भी स्पष्ट हुआ कि यह मुद्दा अब केवल पशु प्रबंधन तक सीमित नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरी शासन और सामाजिक व्यवहार से जुड़ा विषय बन चुका है।