इंदौर हाईकोर्ट की खंडपीठ के एक हालिया आदेश ने शहर के मास्टर प्लान की वैधता पर नई बहस शुरू कर दी है। सिंगल बेंच ने 5 फरवरी को पारित आदेश में कहा कि 1 जनवरी 2008 से लागू इंदौर का मास्टर प्लान 31 मार्च 2021 को समाप्त हो गया। यह टिप्पणी मिसलेनियस पीटिशन क्रमांक 4687/25, राज बिसानी व अन्य बनाम प्रदेश व अन्य, में दर्ज की गई है।
मामला लसूडियामोरी क्षेत्र की एक जमीन पर व्यावसायिक निर्माण अनुमति से जुड़ा था। संबंधित भूखंड मास्टर प्लान में बस स्टैंड या पिकअप स्टेशन के लिए आरक्षित बताया गया। इसी आधार पर पहले विभाग स्तर पर और बाद में शासन स्तर पर जमीन मालिक की अपीलें खारिज हुईं। इसके बाद याचिकाकर्ता हाईकोर्ट पहुंचे।
17 पेज के आदेश में कोर्ट ने पूर्व के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों का हवाला देते हुए नगर तथा ग्राम निवेश को निर्देश दिया कि संबंधित जमीन पर व्यवसायिक निर्माण की अनुमति, यानी अभिन्यास, 60 दिनों में मंजूर किया जाए। आदेश में यह भी कहा गया कि जिस जमीन पर बस स्टैंड/पिकअप स्टेशन प्रस्तावित था, वहां पिछले करीब 20 वर्षों में शासन की ओर से ऐसी कोई ठोस गतिविधि नहीं हुई।
जमीन का रिकॉर्ड, पुरानी अनुमति और स्वामित्व परिवर्तन
विवादित जमीन लसूडियामोरी के खसरा नंबर 103/1 पैकी की बताई गई है। इसका क्षेत्रफल 0.498 हेक्टेयर, यानी 53,604.42 वर्गफीट दर्ज है। आदेश में यह तथ्य भी शामिल है कि इस भूमि पर 1981 में कोल्ड स्टोरेज की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने माना कि स्वामित्व बदलने भर से पूर्व अनुमति स्वतः समाप्त नहीं होती।
याचिकाकर्ता राज बिसानी ने यह भूमि 2023 में दो रजिस्ट्री के जरिए खरीदी थी। अदालत के समक्ष यह पक्ष भी रखा गया कि 1981 की कोल्ड स्टोरेज अनुमति के साथ जमीन का उपयोग व्यावसायिक प्रकृति में परिवर्तित माना जा चुका था। इसी पृष्ठभूमि में नए अभिन्यास की मांग की गई थी।
मास्टर प्लान की समाप्ति तिथि पर कानूनी बहस
आदेश के बिंदु क्रमांक 25 में 31 मार्च 2021 की तिथि लिखे जाने पर कानूनी हलकों में अलग चर्चा है। कुछ अभिभाषक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि यह तारीख किस आधार पर दर्ज हुई, क्योंकि उनकी राय में 31 दिसंबर 2021 का संदर्भ अपेक्षित माना जा रहा था। हालांकि फिलहाल प्रभावी स्थिति वही है जो न्यायिक आदेश में दर्ज है।
नगर तथा ग्राम निवेश विभाग ने आदेश पर आगे की कानूनी रणनीति शुरू कर दी है। विभागीय स्तर पर महाधिवक्ता से राय ली जा रही है और अपील की तैयारी की जा रही है। विभाग का कहना है कि आम प्रशासनिक प्रथा में नया मास्टर प्लान लागू होने तक पुरानी योजना के प्रावधान लागू माने जाते रहे हैं और उसी आधार पर अनुमतियां दी जाती रही हैं।
विभाग की चिंता: पिछले वर्षों की अनुमतियों पर असर
विभाग से जुड़े जानकारों का कहना है कि अगर आदेश की इस व्याख्या को व्यापक रूप से लागू माना गया, तो पिछले करीब पांच वर्षों में जारी कई अनुमतियों पर प्रश्न खड़े हो सकते हैं। यही वजह है कि इस फैसले को उच्च स्तर पर चुनौती देने की प्रक्रिया तेज की गई है। प्रशासनिक हलकों में इसे नीति और नियोजन, दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि शहरों के मास्टर प्लान आम तौर पर प्रोजेक्टेड आबादी के आधार पर बनते हैं और कई प्रस्ताव तय समय में पूर्ण नहीं हो पाते। इसलिए व्यवहार में योजना प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। उदाहरण के तौर पर भोपाल के पुराने मास्टर प्लान का संदर्भ भी दिया जा रहा है, जो निर्धारित अवधि के बाद भी व्यावहारिक रूप से लागू रहा।
इंदौर में फिलहाल 2045 के मास्टर प्लान पर काम जारी है। ऐसे में हाईकोर्ट के इस आदेश का प्रभाव केवल एक भूखंड या एक अनुमति तक सीमित नहीं रह सकता। अपील में जो भी अंतिम व्याख्या सामने आएगी, वही आगे शहर की भूमि उपयोग नीतियों, आरक्षण प्रावधानों और निर्माण अनुमतियों की प्रक्रिया को दिशा देगी।