रेसीडेंसी कोठी की रसोई में कॉकरोच मिलने से नाराज़ MP के राज्यपाल, खाना छोड़ जताई सख्त नाराजगी

मध्यप्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल के इंदौर प्रवास के दौरान रेजिडेंसी कोठी की रसोई व्यवस्था को लेकर बड़ा सवाल उठ गया। जानकारी के अनुसार, किचन में कॉकरोच मिलने के बाद राज्यपाल ने वहां तैयार भोजन लेने से इनकार कर दिया। यह मामला सामने आते ही प्रशासनिक स्तर पर हलचल बढ़ी और वीवीआईपी आतिथ्य से जुड़ी व्यवस्थाओं की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया जाने लगा।

रेजिडेंसी कोठी इंदौर में उच्च स्तरीय कार्यक्रमों और विशिष्ट अतिथियों के ठहराव के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रमुख सरकारी लोकेशन मानी जाती है। ऐसे स्थान पर खाद्य स्वच्छता में कमी का सामने आना व्यवस्था पर सीधे सवाल खड़ा करता है। राज्यपाल का भोजन न लेना इसी संदर्भ में एक गंभीर संकेत माना जा रहा है कि रसोई संचालन और निरीक्षण तंत्र अपेक्षित स्तर पर नहीं था।

घटना का केंद्र बिंदु रसोई में स्वच्छता की स्थिति रही। किचन जैसी जगह, जहां प्रतिदिन भोजन तैयार होता है, वहां कीट मिलने का अर्थ है कि सफाई, स्टोरेज और नियमित मॉनिटरिंग की प्रक्रिया में चूक हुई। राज्यपाल के स्तर के प्रोटोकॉल में सामान्य तौर पर भोजन की गुणवत्ता और हाइजीन की बहुस्तरीय जांच होती है। इसके बावजूद ऐसी स्थिति सामने आना प्रशासनिक जिम्मेदारी तय करने का विषय बन गया है।

वीवीआईपी प्रोटोकॉल में फूड सेफ्टी सबसे अहम कड़ी

किसी भी राजभवन, अतिथि गृह या सरकारी रेजिडेंसी में वीवीआईपी दौरे के दौरान फूड सेफ्टी को अनिवार्य प्राथमिकता दी जाती है। इसमें कच्चे माल की गुणवत्ता, किचन की सफाई, स्टाफ की स्वच्छता, पकवान की तैयारी और सर्विंग तक हर चरण की निगरानी शामिल रहती है। इंदौर की इस घटना ने यह स्पष्ट किया कि सिस्टम मौजूद होने के बावजूद जमीनी क्रियान्वयन में कमी रह जाए तो सुरक्षा और प्रतिष्ठा दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

इस तरह के मामलों में आमतौर पर सबसे पहले मौके की सफाई, किचन का सैनिटाइजेशन और तत्काल निरीक्षण कराया जाता है। इसके बाद संबंधित कर्मचारियों और जिम्मेदार इकाइयों से तथ्य जुटाए जाते हैं। इंदौर की इस घटना ने भी यही सवाल उठाया कि क्या नियमित निरीक्षण समय पर हुआ था, और यदि हुआ था तो रसोई की यह स्थिति कैसे बनी रही।

प्रशासनिक जवाबदेही और व्यवस्था सुधार पर फोकस

घटना के बाद सबसे बड़ा मुद्दा जवाबदेही का है। रेजिडेंसी कोठी जैसे संवेदनशील परिसर में रसोई संचालन केवल दैनिक कामकाज नहीं, बल्कि सरकारी प्रोटोकॉल की विश्वसनीयता से भी जुड़ा होता है। इसलिए इस मामले में व्यवस्था सुधार, निगरानी की आवृत्ति और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की समीक्षा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह मामला केवल एक दिन की असुविधा तक सीमित नहीं है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि सरकारी अतिथि स्थलों में खाद्य सुरक्षा के मानकों पर निरंतर ऑडिट और स्वतंत्र जांच तंत्र की आवश्यकता है। जब शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति भोजन लेने से इनकार करता है, तो संदेश स्पष्ट होता है कि मानकों में कोई समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता।

इंदौर की रेजिडेंसी कोठी से जुड़ा यह घटनाक्रम अब प्रशासनिक और प्रोटोकॉल प्रबंधन, दोनों के लिए एक केस स्टडी की तरह देखा जा रहा है। आने वाले समय में यदि इस पर ठोस सुधारात्मक कदम उठते हैं, तो यह न केवल वीवीआईपी प्रबंधन बल्कि सामान्य सरकारी परिसरों की रसोई व्यवस्था के लिए भी उपयोगी मिसाल बन सकता है। फिलहाल मामला इस बात पर केंद्रित है कि स्वच्छता संबंधी चूक कैसे हुई और भविष्य में इसे दोहराने से रोकने के लिए क्या स्थायी व्यवस्था बनाई जाती है।