मध्य प्रदेश में शहरी विकास की ठोस और समग्र योजना के अभाव ने कई गंभीर समस्याओं को जन्म दिया है। पांच प्रमुख शहरों में नालों, नदियों के किनारे और खुले सार्वजनिक स्थानों पर बड़े पैमाने पर अतिक्रमण सामने आया है। इतना ही नहीं, शहरों से सटे ग्रामीण इलाकों में भी अनधिकृत कॉलोनियों और अवैध निर्माण का विस्तार हुआ है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार नालों पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण के कुल 539 प्रकरण दर्ज किए गए हैं, जो शहरी नियोजन की कमजोरियों को उजागर करते हैं।
राजधानी भोपाल के 16 गांवों में 126 अनधिकृत विकास के मामले दर्ज किए गए हैं। ये प्रकरण मुख्य रूप से आवासीय भूमि पर बिना अनुमति प्लॉटिंग, कॉलोनियों के विकास और भवन निर्माण से जुड़े हैं। शिकायतें लगातार बढ़ती रहीं, लेकिन संबंधित निकायों द्वारा समय रहते ठोस और प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। इससे अवैध निर्माण को अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिला और नियामक व्यवस्था की कार्यशैली पर सवाल खड़े हुए।
इस पूरे मामले पर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने अपनी रिपोर्ट में गंभीर आपत्तियां दर्ज की हैं। कैग ने अप्रैल 2018 से मार्च 2023 के बीच संचालक नगर तथा ग्राम निवेश संचालनालय (टीएंडसीपी) की कार्यप्रणाली की समीक्षा करते हुए पाया कि कई स्तरों पर नियमों की अनदेखी की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि नगर निगमों ने आंतरिक विकास कार्य पूर्ण हुए बिना कॉलोनियों के बंधक भूखंडों को अनियमित रूप से मुक्त कर दिया, जो नियमों के विपरीत है।
जांच में यह भी सामने आया कि कई आवासीय परिसरों, अस्पतालों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और शैक्षणिक संस्थानों को धूसर जल निस्सारण प्रबंधन योजना प्राप्त किए बिना ही भवन निर्माण की अनुमति दे दी गई। 40 आवेदकों पर 22.45 लाख रुपये का अर्थदंड लगाया जाना था, लेकिन संबंधित निकायों ने यह जुर्माना नहीं वसूला। इसके अतिरिक्त जबलपुर और इंदौर सहित अन्य नगर निगमों में भूस्वामियों और बिल्डरों द्वारा पर्यावरणीय अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) तथा ईआईए रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई, फिर भी अनुमतियां जारी कर दी गईं।
अतिक्रमण के मामलों में सबसे अधिक प्रकरण भोपाल और इंदौर में दर्ज हुए हैं, जहां प्रत्येक में 150-150 मामले सामने आए। इसके बाद ग्वालियर में 128, जबलपुर में 75 और उज्जैन में 36 प्रकरण दर्ज किए गए। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि बड़े शहरों में शहरी विस्तार नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है और जल निकासी तंत्र तथा पर्यावरणीय संतुलन पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते सख्त नियमन, प्रभावी मॉनिटरिंग और पारदर्शी अनुमोदन प्रणाली लागू नहीं की गई, तो भविष्य में बाढ़, जलभराव और पर्यावरणीय संकट जैसी समस्याएं और गंभीर रूप ले सकती हैं। कैग की रिपोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि शहरी विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करना अब अत्यंत आवश्यक हो गया है।