इंदौर विकास प्राधिकरण की बड़ी चुनौती: 120 करोड़ के दो ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ बने गले की हड्डी

Indore News: विकास की दौड़ में नए कीर्तिमान स्थापित करने वाले इंदौर विकास प्राधिकरण (IDA) के लिए वर्तमान में उसके दो सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स—’स्नेह धाम’ और ‘आईएसबीटी’ (ISBT)—गले की हड्डी बन गए है।
लगभग 120 करोड़ रुपये की कुल लागत से तैयार ये दोनों परियोजनाएं धरातल पर आने के बाद भी अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल साबित हो रही हैं। आलम यह है कि करोड़ों की लागत वाली इन आलीशान इमारतों के संचालन के लिए आईडीए को कोई सक्षम एजेंसी नहीं मिल रही है।
100 करोड़ का आईएसबीटी: न बसें, न यात्री; छठी बार टेंडर जारी
इंदौर के ग्राम कुमेड़ी में लगभग 15 एकड़ जमीन पर बनकर तैयार हुआ प्रदेश का सबसे बड़ा और अत्याधुनिक अंतरराज्यीय बस टर्मिनल (ISBT) एक साल से अधिक समय से वीरान पड़ा है। 100 करोड़ की भारी-भरकम लागत से तैयार इस टर्मिनल को एयरपोर्ट की तर्ज पर डिजाइन किया गया है, जहाँ 24/7 वातानुकूलित सुविधाएं और 14 टिकट काउंटर उपलब्ध हैं।
संकट की स्थिति:
  • लोकार्पण का इंतजार: मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा दो बार निरीक्षण किए जाने के बावजूद अब तक इसका औपचारिक लोकार्पण नहीं हो सका है।
  • संचालन में अरुचि: आईडीए अब तक इसके संचालन के लिए 6 बार टेंडर जारी कर चुका है। शुरुआती टेंडरों में कोई रिस्पांस नहीं मिला, जबकि तीसरे टेंडर में आई एकमात्र कंपनी अयोग्य पाई गई।
  • क्षमता का नुकसान: यह टर्मिनल रोजाना 1,440 बसों के संचालन के लिए तैयार है, लेकिन वर्तमान में यहाँ एक भी बस नहीं पहुँच रही है।
स्नेह धाम: 20 करोड़ का ‘फाइव स्टार’ वृद्धाश्रम, रहने वाले सिर्फ दो परिवार
योजना क्रमांक 134 में बुजुर्गों के लिए बनाया गया 6 मंजिला ‘स्नेह धाम’ भी इसी तरह की बेहाली का सामना कर रहा है। 20 हजार वर्ग फीट के प्लॉट पर 20 करोड़ की लागत से बनी इस बिल्डिंग में 32 फ्लैट्स (22 टू-बीएचके और 10 वन-बीएचके) हैं। इसका उद्देश्य उन बुजुर्गों को आत्म-सम्मान और सुरक्षा देना था जिनके बच्चे बाहर रहते हैं।
विफलता के कारण:
  • ठेकेदार का पलायन: संचालन का ठेका पहले रतलाम की कंपनी ‘बालाजी सेंट्रला होम्स’ को दिया गया था, लेकिन कम निवासी (मात्र 4-5 बुजुर्ग) होने के कारण प्रबंधन में घाटा बताकर ठेकेदार काम छोड़ गया।
  • वर्तमान स्थिति: मुख्यमंत्री द्वारा 25 जून 2025 को उद्घाटन किए जाने के बावजूद, इस 32 फ्लैट की बिल्डिंग में फिलहाल केवल दो बुजुर्ग परिवार ही रह रहे हैं।
  • उम्मीद की किरण: वर्तमान में तीन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) ने संचालन के लिए आईडीए से संपर्क किया है, लेकिन अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है।
निजी हाथों की तलाश और पीपीपी मोड की विफलता
इन दोनों प्रोजेक्ट्स को पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मोड पर संचालित करने की योजना थी। विशेषज्ञों का मानना है कि आईडीए की कड़ी शर्तें या उच्च बेस प्राइस के कारण निजी एजेंसियां इन प्रोजेक्ट्स में रुचि नहीं ले रही हैं।

“आईडीए ने आधुनिक अवधारणा के साथ ये प्रोजेक्ट्स तैयार किए थे, लेकिन उचित प्रबंधन और संचालन एजेंसी के अभाव में यह सरकारी धन की बर्बादी जैसा प्रतीत हो रहा है।”

इंदौर की जनता और प्रशासन दोनों के लिए यह चिंता का विषय है कि जहाँ शहर को नए इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है, वहीं तैयार इंफ्रास्ट्रक्चर धूल फांक रहा है। यदि जल्द ही अनुभवी संचालक नहीं मिलते, तो रखरखाव के अभाव में इन इमारतों की स्थिति और खराब हो सकती है। फिलहाल, शहरवासियों की नजरें आईडीए के छठे टेंडर और एनजीओ के साथ होने वाली बातचीत पर टिकी हैं।