एमपी सरकार का बड़ा फैसला, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स को मिलेगा इंडस्ट्री का दर्जा, किसानों को होगा सीधा फायदा

मध्य प्रदेश सरकार ने फूड प्रोसेसिंग इकाइयों को उद्योग का दर्जा देने की दिशा में अहम निर्णय लिया है। इंदौर से सामने आई इस जानकारी के बाद कृषि उपज से जुड़े उद्यमों के लिए नीतिगत ढांचा बदलने की तैयारी मानी जा रही है। अब तक प्रसंस्करण क्षेत्र को कई मामलों में अलग श्रेणी में देखा जाता था, लेकिन नए दर्जे के बाद इसे औद्योगिक नीति के दायरे में लाने का रास्ता साफ होगा।

राज्य में सोयाबीन, गेहूं, दालें, मसाले, फल और सब्जियों पर आधारित बड़ी संख्या में प्रोसेसिंग इकाइयां काम करती हैं। इन इकाइयों का एक हिस्सा संगठित क्षेत्र में है, जबकि बड़ी संख्या सूक्ष्म और लघु स्तर पर संचालित होती है। उद्योग का दर्जा मिलने से इन उद्यमों को पंजीयन, अनुमतियां, परियोजना स्वीकृति और संस्थागत वित्त से जुड़ी प्रक्रियाएं अधिक स्पष्ट ढांचे में मिल सकती हैं।

इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, सीहोर, होशंगाबाद और मालवा-निमाड़ क्षेत्र में कृषि प्रसंस्करण गतिविधियां लंबे समय से विस्तार की मांग कर रही थीं। कारोबार से जुड़े पक्ष लगातार यह कहते रहे हैं कि खाद्य प्रसंस्करण को कृषि और उद्योग के बीच की श्रेणी मानने से कई योजनाओं का लाभ सीमित हो जाता है। उद्योग दर्जा मिलने पर नीतियां, प्रोत्साहन और अनुमोदन प्रक्रियाएं एकीकृत होने की संभावना बढ़ती है।

उद्योग दर्जे का व्यावहारिक असर

फूड प्रोसेसिंग इकाइयों के लिए उद्योग दर्जा आम तौर पर तीन स्तरों पर असर डालता है। पहला, परियोजनाओं को औद्योगिक इकाई की तरह फाइल करने की सुविधा मिलती है। दूसरा, बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों में ऋण मूल्यांकन औद्योगिक मानकों के अनुरूप होता है। तीसरा, राज्य की औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं तक पहुंच आसान होती है। मध्य प्रदेश के संदर्भ में यह बदलाव खास इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि राज्य कृषि उत्पादन के साथ मूल्य संवर्धन बढ़ाने पर जोर दे रहा है।

खाद्य प्रसंस्करण में प्राथमिक सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, कोल्ड चेन, स्टोरेज, ब्रांडिंग और निर्यात लिंक जैसे कई चरण शामिल होते हैं। छोटे उद्यमों के लिए इन चरणों में निवेश करना चुनौतीपूर्ण होता है। यदि उद्योग दर्जे के साथ नीति-आधारित सुविधा लागू होती है, तो क्लस्टर आधारित विकास, साझा अवसंरचना और प्रसंस्करण क्षमता विस्तार को गति मिल सकती है।

कृषि से बाजार तक वैल्यू चेन पर फोकस

मध्य प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसानों की आय और ग्रामीण रोजगार पर प्रसंस्करण क्षेत्र का सीधा संबंध रहता है। कच्चे माल की स्थानीय खरीद बढ़ने से परिवहन लागत और भंडारण दबाव कम किया जा सकता है। वहीं, प्रसंस्कृत उत्पादों की शेल्फ लाइफ बढ़ने से बाजार विस्तार और इंटर-स्टेट सप्लाई में मदद मिलती है। सरकार का यह कदम कृषि उपज को सीधे बाजार योग्य उत्पाद में बदलने वाली इकाइयों को संस्थागत पहचान देने की दिशा में देखा जा रहा है।

इंदौर क्षेत्र में पहले से मौजूद खाद्य उद्योग, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और मंडी तंत्र को देखते हुए इस फैसले का असर तेजी से दिख सकता है। खासकर वे इकाइयां जो अभी तक सीमित क्षमता पर काम कर रही थीं, वे विस्तार की योजना बना सकती हैं। हालांकि अंतिम प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि विभागीय आदेश, पात्रता मानदंड और लागू होने की समयरेखा किस रूप में जारी होती है।

अगला चरण: अधिसूचना और क्रियान्वयन

नीतिगत घोषणा के बाद सामान्यतः संबंधित विभागों की अधिसूचना, परिभाषाओं की स्पष्टता और आवेदन प्रक्रिया का निर्धारण होता है। फूड प्रोसेसिंग इकाइयों के मामले में भी यही चरण निर्णायक रहेंगे। उद्योग विभाग, खाद्य प्रसंस्करण से जुड़े प्रशासनिक तंत्र और वित्तीय संस्थाओं के बीच समन्वय जितना तेज होगा, जमीन पर लाभ उतनी जल्दी दिखेगा।

फिलहाल यह निर्णय राज्य के औद्योगिक और कृषि-आधारित विकास मॉडल के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। यदि नीति का क्रियान्वयन समयबद्ध रहा, तो मध्य प्रदेश में प्रसंस्करण क्षेत्र की क्षमता, निवेश आकर्षण और रोजगार सृजन तीनों पर सकारात्मक असर दर्ज किया जा सकता है।