मध्य प्रदेश की लाड़ली लक्ष्मी योजना को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने लाभ वितरण की वास्तविक स्थिति पर ध्यान खींचा है। भोपाल से प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, योजना से जुड़ी कुल पात्र बालिकाओं में से केवल लगभग 20 प्रतिशत को ही अंतिम चरण में मिलने वाली एक लाख रुपये की राशि मिल सकेगी। यह अंतर बताता है कि योजना का दायरा बड़ा होने के बावजूद अंतिम लाभ तक पहुंच सीमित है।
राज्य में लाड़ली लक्ष्मी योजना लंबे समय से बालिका सशक्तिकरण और शिक्षा प्रोत्साहन के उद्देश्य से लागू है। योजना का ढांचा इस तरह बनाया गया है कि पंजीकरण के बाद अलग-अलग चरणों में लाभ दिया जाए और निर्धारित शर्तें पूरी होने पर अंत में बड़ी राशि जारी हो। लेकिन मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि पंजीकरण से अंतिम भुगतान तक का रास्ता कई लाभार्थियों के लिए आसान नहीं है।
रिपोर्ट में मुख्य तथ्य यही है कि एक लाख रुपये वाले अंतिम लाभ तक पहुंचने का अनुपात काफी कम है। इस अनुपात का अर्थ यह भी है कि बड़ी संख्या में लाभार्थी बीच के किसी चरण में अटक रही हैं या अंतिम पात्रता पूरी नहीं कर पा रही हैं। ऐसे मामलों में आयु, दस्तावेज, शिक्षा संबंधी निरंतरता और अन्य औपचारिक शर्तें प्रभाव डाल सकती हैं, जिनकी समय पर मॉनिटरिंग जरूरी मानी जाती है।
योजना का आकार बड़ा, अंतिम लाभ का दायरा छोटा
लाड़ली लक्ष्मी योजना की सार्वजनिक पहचान राज्य की प्रमुख बालिका योजनाओं में है। गांव से शहर तक बड़ी संख्या में परिवार अपनी बेटियों का पंजीकरण कराते हैं। इसके बावजूद जब अंतिम भुगतान के स्तर पर केवल 20 प्रतिशत का आंकड़ा सामने आता है, तो यह प्रशासनिक समीक्षा का विषय बनता है। नीति स्तर पर योजना का उद्देश्य तभी पूरा माना जाएगा, जब अधिकाधिक पात्र लाभार्थी अंतिम चरण तक पहुंचें।
योजना से जुड़े मामलों में अक्सर यह भी देखा जाता है कि परिवारों को समय पर प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं मिल पाती। आवेदन की स्थिति, अपडेट, सत्यापन और पात्रता से जुड़ी जानकारी यदि लगातार उपलब्ध रहे, तो छूटने वाले मामलों की संख्या कम हो सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि डेटा-आधारित फॉलोअप और जिला स्तर पर नियमित समीक्षा से अंतिम लाभ लेने वालों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।
आंकड़ों से उठे क्रियान्वयन से जुड़े सवाल
एक लाख रुपये जैसी बड़ी सहायता राशि का उद्देश्य बालिकाओं के भविष्य को आर्थिक आधार देना है। इसलिए जब अधिकांश लाभार्थी इस स्तर तक नहीं पहुंच पातीं, तो सवाल सिर्फ बजट का नहीं, बल्कि क्रियान्वयन की प्रभावशीलता का भी होता है। राज्य स्तर पर योजना के रजिस्ट्रेशन, सक्रिय लाभार्थी और अंतिम भुगतान पाने वालों के बीच गैप को कम करना प्रशासनिक प्राथमिकता बन सकता है।
भोपाल केंद्रित इस रिपोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि योजना का सामाजिक असर बढ़ाने के लिए केवल नामांकन पर्याप्त नहीं है। जरूरत उस सिस्टम की है, जो लाभार्थी को शुरुआत से अंतिम भुगतान तक ट्रैक करे और हर चरण पर सहायता दे। इससे योजना के घोषित लक्ष्य और जमीनी परिणाम के बीच का अंतर घटाया जा सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है कि मध्य प्रदेश में लाड़ली लक्ष्मी योजना के तहत एक लाख रुपये का लाभ सीमित प्रतिशत तक सिमट रहा है। आने वाले समय में सरकार और संबंधित विभागों की रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि पात्र लाभार्थियों का बड़ा हिस्सा अंतिम चरण तक कैसे पहुंचाया जाए।