भागीरथपुरा जलकांड: जस्टिस सुशील गुप्ता आयोग ने 28 फरवरी तक मांगे साक्ष्य

Indore News: इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में जांच प्रक्रिया तेज कर दी गई है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर गठित आयोग ने प्रभावित क्षेत्र के लोगों से साक्ष्य और दस्तावेज जमा कराने की समयसीमा 28 फरवरी तय की है। इस समयसीमा में अब चार दिन शेष बताए गए हैं। आयोग की अध्यक्षता पूर्व हाईकोर्ट जज जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता कर रहे हैं।
यह मामला पिछले दिनों तब सामने आया था, जब भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से 35 लोगों की मौत दर्ज हुई। बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े और अस्पतालों में भर्ती हुए। प्रशासनिक कार्रवाई के साथ न्यायिक निगरानी में तथ्य जुटाने के लिए आयोग बनाया गया, ताकि कारणों और जिम्मेदारियों का औपचारिक निर्धारण हो सके।
आयोग को जल प्रदूषण के स्रोत, पाइपलाइन प्रणाली में संभावित गड़बड़ी, प्रशासनिक स्तर पर संभावित लापरवाही और जनहानि से जुड़े पहलुओं की जांच करनी है। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि किन व्यक्तियों या एजेंसियों की भूमिका रही, किस स्तर पर निगरानी में कमी रही और भविष्य में ऐसी स्थिति रोकने के लिए कौन से सुधारात्मक कदम जरूरी हैं। जांच पूरी होने के बाद आयोग अपनी रिपोर्ट कोर्ट में सौंपेगा।
किससे मांगे गए हैं रिकॉर्ड और साक्ष्य
आयोग ने सार्वजनिक सूचना जारी कर भागीरथपुरा और आसपास के प्रभावित इलाकों के नागरिकों को दस्तावेज देने के लिए कहा है। इसमें प्रभावित लोगों के परिजन, स्थानीय जनप्रतिनिधि, चिकित्सक, अस्पताल प्रबंधन, सामाजिक संगठन, ठेकेदार और शासकीय अधिकारी शामिल हैं। आयोग का उद्देश्य अलग-अलग स्रोतों से तथ्य जुटाकर घटनाक्रम की एक प्रमाणिक और दस्तावेजी तस्वीर तैयार करना है।
जांच में केवल आधिकारिक फाइलों पर निर्भर रहने के बजाय आयोग ने प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को भी महत्व दिया है। इसी वजह से नागरिकों और संस्थाओं से कहा गया है कि वे अपने पास उपलब्ध शिकायत पत्र, मेडिकल अभिलेख, फोटो-वीडियो और विभागीय रिकॉर्ड लिखित अभ्यावेदन के साथ प्रस्तुत करें।
किन दस्तावेजों को प्राथमिकता दी गई
आयोग ने जिन अभिलेखों की मांग की है, उनमें पेयजल प्रदूषण से जुड़ी शिकायतें, अस्पताल में भर्ती पर्चियां, डिस्चार्ज समरी, उपचार रिकॉर्ड और मृत्यु प्रमाण पत्र शामिल हैं। इसके अलावा पाइपलाइन रिसाव, सीवेज मिश्रण या जल आपूर्ति में तकनीकी त्रुटि दर्शाने वाले फोटो और वीडियो भी महत्वपूर्ण साक्ष्य माने गए हैं।
जल आपूर्ति व्यवस्था से संबंधित टेंडर दस्तावेज, कार्य आदेश, निरीक्षण रिपोर्ट और रखरखाव से जुड़ी अन्य सामग्री भी मांगी गई है। इन दस्तावेजों से यह जांचने में मदद मिलेगी कि काम किस एजेंसी को दिया गया, निगरानी कैसे हुई, और किसी शिकायत के बाद किस स्तर पर क्या कार्रवाई हुई।
अभ्यावेदन कहां और कैसे जमा होगा
आयोग ने स्पष्ट किया है कि सभी संबंधित व्यक्ति 28 फरवरी तक व्यक्तिगत रूप से लिखित अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। इसके लिए स्थान तय किया गया है: स्कीम नंबर 140, आरसीएम-10, प्रथम मंजिल, आनंद वन (स्कीम नंबर 140) स्थित आयोग कार्यालय। निर्धारित समय के भीतर जमा हुए अभिलेख ही औपचारिक जांच का हिस्सा बनेंगे।
समयसीमा पार होने के बाद दिए गए दस्तावेजों पर विचार का दायरा सीमित हो सकता है, इसलिए प्रभावित पक्षों के लिए उपलब्ध समय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आयोग की प्रक्रिया में लिखित रिकॉर्ड का विशेष महत्व है, क्योंकि इन्हीं के आधार पर तथ्यों का सत्यापन और जिम्मेदारियों का विश्लेषण किया जाएगा।
मेडिकल असर और मौजूदा स्थिति भी जांच के दायरे में
आयोग को केवल मौतों की संख्या तक सीमित जांच नहीं करनी है। उसे यह भी देखना है कि प्रभावित लोगों पर चिकित्सकीय असर कितना व्यापक था, इलाज की उपलब्धता और समयबद्धता कैसी रही, और स्वास्थ्य तंत्र ने आपात स्थिति में कैसे प्रतिक्रिया दी। यह हिस्सा आगे के सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रोटोकॉल तय करने में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस प्रकरण में 35 मौतें दर्ज हुईं। 450 से अधिक मरीज इलाज के बाद ठीक होकर डिस्चार्ज हो चुके हैं, जबकि एक महिला मरीज का इलाज अभी अस्पताल में चल रहा है। इन आंकड़ों को भी आयोग अपनी रिपोर्ट में संदर्भ के तौर पर शामिल करेगा।
कुल मिलाकर, जांच का अगला चरण रिकॉर्ड संकलन का है और इसके लिए अंतिम तिथि नजदीक है। प्रभावित परिवारों, स्थानीय नागरिकों और संबंधित संस्थाओं के पास अब सीमित समय है कि वे अपने दस्तावेज आयोग के सामने रखें। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही अदालत आगे की कार्रवाई और जवाबदेही का ढांचा तय करेगी।