इंदौर में गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनों से जुड़ा बड़ा प्रशासनिक विवाद सामने आया है। कलेक्टर शिवम वर्मा ने 10 फरवरी 2026 को जारी तीन पेज के आदेश को 72 घंटे के भीतर संशोधित कर दिया। संशोधित आदेश में खजराना स्थित आदर्श श्रमिक गृह निर्माण संस्था की 2.529 हेक्टेयर जमीन को शहरी सीलिंग प्रावधानों के तहत शासन में वैस्थित करने की दिशा में अलग से पत्र जारी करने की बात कही गई है।
मामला उन जमीनों से जुड़ा है, जिन्हें ऑपरेशन भूमाफिया के दौरान दबंग कब्जों से मुक्त कराने, भूखंड पीड़ितों को राहत देने और कुछ मामलों में सरकारी घोषित करने की प्रक्रिया में शामिल किया गया था। प्रशासनिक रिकॉर्ड के अनुसार, नगर भूमि सीमा अधिनियम के तहत धारा 20(क) में मिली छूट का कई संस्थाओं में दुरुपयोग पाया गया था।
4 नवंबर 2022 के आदेश की पृष्ठभूमि
तत्कालीन कलेक्टर मनीष सिंह ने 4 नवंबर 2022 को विस्तृत आदेश जारी किया था। इस आदेश में कई संस्थाओं की जमीनों को छूट शर्तों के उल्लंघन के आधार पर शासन में वैस्थित करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी और प्रस्ताव राजस्व विभाग, भोपाल को भेजा गया था। प्रशासनिक आकलन के मुताबिक, इससे सैकड़ों संस्थाओं की हजारों एकड़ जमीन सरकारी प्रक्रिया में आई, जिनका वर्तमान बाजार मूल्य अरबों रुपये में है।
इसके बाद से प्रभावित संस्थाओं की ओर से कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर राहत पाने की कोशिशें चलती रहीं। इंदौर के पूर्व कलेक्टर डॉ. इलैया राजा और बाद में आशीष सिंह के कार्यकाल में इस विषय पर नया राहतकारी आदेश पारित नहीं हुआ। आशीष सिंह ने 20 जून 2024 को प्रमुख सचिव, राजस्व विभाग को इस विषय में विस्तृत पत्र भी भेजा था।
आदर्श श्रमिक संस्था से विवाद कैसे खुला
आदर्श श्रमिक गृह निर्माण संस्था के भूखंड पीड़ितों की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई। उषा नगर एक्सटेंशन निवासी ईश्वर पोरवाल ने कलेक्टर न्यायालय में आवेदन देकर मांग की कि जिस तरह अन्य संस्थाओं में धारा 20 के उल्लंघन पर कार्रवाई की गई, उसी तरह आदर्श श्रमिक संस्था की जमीन भी सरकारी घोषित की जाए।
आवेदन में कहा गया कि खजराना के सर्वे नंबर 45, 46/1 और 58/1 की कुल 2.529 हेक्टेयर जमीन पर पहले अपात्र और नए सदस्यों को भूखंड आवंटन किया गया और बाद में जमीन पर पूर्ण कब्जा कर लिया गया।
इस आवेदन पर कलेक्टर ने अपर कलेक्टर एवं सक्षम प्राधिकारी रिंकेश वैश्य से प्रतिवेदन मांगा। प्रतिवेदन में धारा 20 की छूट के दुरुपयोग का उल्लेख किया गया, लेकिन यह भी कहा गया कि शहरी सीलिंग कानून समाप्त होने के बाद इस तरह की कार्रवाई का अधिकार नहीं बचा।
इसी प्रतिवेदन के आधार पर 10 फरवरी 2026 का आदेश पारित हुआ, जिसमें कलेक्टर न्यायालय ने अधिकार क्षेत्र न होने की बात लिखते हुए पक्षकारों को सक्षम सहकारी न्यायालय या अधिकरण में जाने का विकल्प बताया।
10 फरवरी के आदेश से क्या जोखिम था
प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यदि यह आदेश प्रभावी रहता तो केवल आदर्श श्रमिक संस्था ही नहीं, बल्कि उन 186 संस्थाओं को भी राहत का आधार मिल सकता था, जिनकी जमीनें 4 नवंबर 2022 के आदेश के बाद जांच और वैस्थितीकरण प्रक्रिया में थीं। 2022 के बाद से ऐसी संस्थाओं को प्रशासन से एनओसी नहीं मिली थी। इसलिए यह आदेश भविष्य की कई फाइलों में मिसाल के तौर पर इस्तेमाल हो सकता था।
72 घंटे में संशोधन, 18 घंटे दस्तावेज जांच
विवादित आदेश के तथ्य सामने आने के बाद कलेक्टर शिवम वर्मा ने मामले की पुन: जांच कराई। रिकॉर्ड के अनुसार, छुट्टी के दिन कार्यालय खोलकर लगभग 18 घंटे दस्तावेजों की समीक्षा की गई। इसके बाद संशोधित आदेश जारी कर 4 नवंबर 2022 के आदेश को संज्ञान में लिया गया और आदर्श श्रमिक संस्था की जमीन के संबंध में शासन को अलग प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया शुरू की गई।
संशोधित आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि शहरी सीलिंग अधिनियम 1976 की धारा 19 और 20 के तहत दी गई विमुक्ति शर्तों का पालन नहीं हुआ और उल्लंघन सिद्ध होता है। प्रशासनिक भाषा में इसे शर्तभंग मानते हुए शासन स्तर पर वैस्थितीकरण की कार्रवाई आवश्यक बताई गई।
आगे क्या होगा
अब अगला कदम राजस्व विभाग और संबंधित शासन स्तर की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा। यदि प्रस्ताव पर निर्णय होता है तो आदर्श श्रमिक संस्था का प्रकरण अन्य लंबित संस्थाओं के मामलों पर भी प्रभाव डाल सकता है। फिलहाल जिला प्रशासन का रुख यह है कि शहरी सीलिंग छूट का दुरुपयोग पाए जाने पर फाइलें बंद नहीं मानी जाएंगी और प्रत्येक मामले की रिकॉर्ड आधारित जांच होगी।
इंदौर में ऑपरेशन भूमाफिया के बाद तैयार हुए मामलों में यह आदेश इसलिए अहम माना जा रहा है, क्योंकि इससे प्रशासनिक स्तर पर यह स्पष्ट हुआ है कि पूर्ववर्ती आदेशों और शर्तभंग के रिकॉर्ड को दरकिनार कर राहत नहीं दी जाएगी।