मध्य प्रदेश में आवारा मवेशियों की बढ़ती मौजूदगी अब दो मोर्चों पर असर डाल रही है। पहला असर खेती पर दिख रहा है, जहां किसानों को फसलों की सुरक्षा के लिए रात में अतिरिक्त चौकसी करनी पड़ रही है। दूसरा असर सड़क सुरक्षा पर है, क्योंकि रात के समय सड़कों पर मवेशियों के अचानक आने से दुर्घटना का खतरा बढ़ रहा है। भोपाल क्षेत्र से भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई हैं।
ग्रामीण इलाकों में किसानों का कहना है कि खेतों तक मवेशियों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। कई जगह दिन की तुलना में रात में स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है। खेती के काम के साथ रात में पहरा देना किसानों के लिए अलग बोझ बन गया है। इससे श्रम, समय और लागत, तीनों पर असर पड़ रहा है।
सड़क उपयोगकर्ताओं के लिए भी यह स्थिति चिंता का विषय बन रही है। स्थानीय लोगों के मुताबिक रात में हाइवे और लिंक रोड पर दृश्यता कम होने के कारण अचानक सामने आए मवेशियों से टकराव का खतरा बढ़ जाता है। दोपहिया वाहन चालकों और छोटे वाहनों के लिए यह जोखिम और ज्यादा माना जा रहा है।
खेती पर सीधा दबाव, रात की निगरानी अनिवार्य
किसानों के सामने समस्या केवल फसल नुकसान तक सीमित नहीं है। खेतों की रखवाली के लिए रात में जागना, परिवार के अन्य कामों और अगले दिन की कृषि गतिविधियों पर भी असर डालता है। कई किसानों को अस्थायी इंतजाम करने पड़ते हैं, जैसे खेत किनारे डेरा या बारी-बारी से निगरानी। इससे नियमित कृषि चक्र बाधित होता है।
ग्रामीणों का कहना है कि छुट्टा मवेशियों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में बोआई और कटाई दोनों समय तनाव बढ़ जाता है। जिन खेतों के आसपास खुला क्षेत्र है, वहां जोखिम ज्यादा देखा जा रहा है। ऐसे इलाकों में किसान रात के समय सामूहिक निगरानी जैसे तरीके भी अपनाते हैं।
रात का सफर क्यों बन रहा जोखिमपूर्ण
रात में सड़क पर मवेशियों की मौजूदगी को स्थानीय लोग बड़ा सुरक्षा मुद्दा मान रहे हैं। कई मार्गों पर स्ट्रीट लाइट की कमी, तेज रफ्तार और मोड़ वाले हिस्सों में दृश्यता घटने से खतरा बढ़ता है। वाहन चालकों को अचानक ब्रेक लगाने या गाड़ी मोड़ने की स्थिति बनती है, जिससे पीछे चल रहे वाहनों के लिए भी जोखिम पैदा होता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की समस्या का समाधान केवल ट्रैफिक नियमों से नहीं होगा। पशु प्रबंधन, स्थानीय निकायों की निगरानी, सुरक्षित बाड़ेबंदी और संवेदनशील मार्गों पर चेतावनी तंत्र जैसे संयुक्त उपाय जरूरी हैं। ग्रामीण और शहरी सीमावर्ती इलाकों में यह चुनौती ज्यादा जटिल रहती है, इसलिए क्षेत्रवार योजना की आवश्यकता बताई जा रही है।
स्थायी समाधान की मांग तेज
स्थानीय स्तर पर लोग प्रशासन से ऐसी व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, जिससे आवारा मवेशियों को सड़क और खेतों से दूर रखा जा सके। किसानों का कहना है कि अस्थायी अभियान से राहत सीमित रहती है, जबकि समस्या लगातार लौट आती है। उनके मुताबिक गांव, पंचायत और नगर निकाय के बीच समन्वित तंत्र बने तो नतीजे बेहतर हो सकते हैं।
फिलहाल स्थिति यह है कि किसान अपनी फसल बचाने के लिए अतिरिक्त प्रयास कर रहे हैं और वाहन चालक रात में अधिक सतर्क होकर सफर करने को मजबूर हैं। भोपाल सहित प्रदेश के कई हिस्सों में यह मुद्दा अब नियमित जन-चर्चा का विषय बन चुका है।