मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) की रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश कर दी गई है। रिपोर्ट में परिसर के स्थापत्य, शिलालेख और विभिन्न कालखंडों के अभिलेखीय साक्ष्यों को क्रमवार दर्ज किया गया है। इसमें परमार राजाओं के समय के सांस्कृतिक कार्यों से लेकर मालवा में मुस्लिम शासन की स्थापना तक के संकेत मिलते हैं।
रिपोर्ट के अनुसार परिसर में कुल 106 स्तंभ पहचाने गए हैं। इन स्तंभों पर अलग-अलग शैली की नक्काशी और डिजाइन दर्ज हैं। साथ ही 32 शिलालेखों का उल्लेख किया गया है, जिनमें कई शिलालेख 10वीं से 13वीं शताब्दी के बीच के सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों को सामने रखते है।
दस्तावेज में कहा गया है कि राजा भोज और राजा अर्जुन वर्मन के काल से संबंधित सामग्री विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कुछ लेखों में अर्जुन वर्मन के राजगुरु मदन का उल्लेख मिलता है। इन्हीं अभिलेखों में ‘पारिजलमंजरी नाटिका’ और ‘विजयश्री’ नाटक के पहले दो अंकों का जिक्र दर्ज है। अलग-अलग पत्थरों पर नाट्यांश और साहित्यिक रचनाओं के अंश भी मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है।
परिसर में परमार काल और बाद के सत्ता परिवर्तन के संकेत
ASI रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कुछ शिलालेख 14वीं शताब्दी के दौरान मालवा में मुसलमानों के आगमन और बाद की राजनीतिक व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं। रिपोर्ट के विवरण के मुताबिक 1389 ईस्वी में दिलावर खान, जिसका मूल नाम हुसैन बताया गया है, को दिल्ली से मालवा प्रांत का राज्यपाल नियुक्त किया गया था।
इसके बाद दिलावर खान द्वारा धार में स्वतंत्रता की घोषणा और इसे राजधानी बनाने का उल्लेख मिलता है। रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि 1401 ईस्वी में उसने शाही उपाधि धारण कर स्वतंत्र शासन चलाया। इन अभिलेखीय संदर्भों को देखते हुए इतिहास और कानून, दोनों स्तरों पर आगे बहस की संभावना बताई जा रही है।
कमाल मौला मस्जिद और मकबरे में 56 अरबी-फारसी शिलालेख
रिपोर्ट में नागपुर के शिलालेख विज्ञान विभाग से जुड़े एक पुरातत्वविद् के अध्ययन का हवाला भी शामिल है। इस अध्ययन में भोजशाला परिसर के भीतर स्थित कमाल मौला मस्जिद और कमाल मौला मकबरे में कुल 56 अरबी और फारसी शिलालेखों का विश्लेषण किया गया। इनमें 43 शिलालेख स्याही से लिखे हुए बताए गए हैं।
इन स्याही-लेखों में वहां आने वाले लोगों का विवरण दर्ज है। कुछ शिलालेख इस्लामी मत, प्रार्थना और ईश्वर के गुणों से संबंधित धार्मिक अंश प्रस्तुत करते हैं, जबकि कुछ में फारसी कविता के दोहे और व्यक्तियों के नाम लिखे हैं। रिपोर्ट के अनुसार ये सामग्री मालवा के मुस्लिम इतिहास, क्षेत्रीय सत्ता संरचना और सामाजिक उपस्थिति को समझने में उपयोगी है।
कुरानिक आयतों वाले अभिलेख और AP-श्रृंखला का विवरण
ASI की रिपोर्ट के मुताबिक कमाल मौला मकबरे के परिसर के भीतर ऐसे शिलालेख मिले हैं, जिन पर कुरान की आयतें दर्ज हैं। इन आयतों का विषय ईश्वर के गुण और एकेश्वरवाद बताया गया है। रिपोर्ट में इन शिलालेखों को दो प्रकार का कहा गया है, हालांकि श्रेणीकरण का तकनीकी विवरण अलग से दर्ज किया गया है।
रिपोर्ट में AP-48 शिलालेख का उल्लेख मालवा के सुल्तान महमूद शाह प्रथम से जोड़ा गया है, जिसे अलाउद्दीन महमूद शाह के नाम से भी जाना जाता है। दस्तावेज के अनुसार हिजरी 861 (1456-57 ईस्वी) में मकबरे के परिसर में गैलरी, आंगन, द्वार का गुंबद, पत्थर की जाली, कोठरियां, कुआं, अंदरूनी हिस्से में ऊंचा चबूतरा, मठ, प्रवेश कक्ष और कंगूरे जैसी संरचनाएं बनवाई गई थीं।
इसी संदर्भ में रिपोर्ट कहती है कि हिजरी 866 (1461-62 ईस्वी) में हबी अल-हाफिज अश-शिराजी अल-मुर्शिदी द्वारा संबंधित शिलालेख तैयार कराया गया। AP-01 शिलालेख कमाल मौला मस्जिद के केंद्रीय मेहराब के आसपास से मिला, AP-02 उपदेश मंच के ऊपर से और AP-03 दक्षिणी दीवार से प्राप्त हुआ।
रिपोर्ट के अनुसार AP-01, AP-02 और AP-03 तीनों कुरानिक शिलालेख हैं और संरचना की इस्लामी पहचान को स्थापित करते हैं। AP-02 को कुरान के अध्याय 51 की आयत 55 का आंशिक भाग बताया गया है। इसी आधार पर यह आकलन रखा गया है कि परिसर का उपयोग धार्मिक-शैक्षिक गतिविधियों, सांस्कृतिक आचरण के प्रसार और व्यापारिक संपर्कों के केंद्र के रूप में भी रहा।
भोजशाला का दीर्घकालीन इतिहास
दस्तावेजी पृष्ठभूमि के तौर पर रिपोर्ट में भोजशाला का इतिहास करीब 990 वर्ष पुराना बताया गया है। इसमें 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा निर्माण और मां वाग्देवी की प्रतिमा स्थापना का उल्लेख आता है। इसी क्रम में यह भी दर्ज है कि दो शताब्दियों से अधिक समय तक परिसर का महत्व बना रहा, जबकि 1305 ईस्वी में मोहम्मद खिलजी के आक्रमण और संरचना को नुकसान पहुंचाने के प्रयास का संदर्भ भी दिया गया है।
हाईकोर्ट में पेश यह रिपोर्ट अब मुकदमे से जुड़े पक्षों के लिए केंद्रीय दस्तावेज मानी जा रही है। अभिलेखीय सामग्री, स्थापत्य परतों और बहु-कालखंडीय साक्ष्यों के आधार पर आने वाले चरण में ऐतिहासिक दावों की नई जांच और कानूनी तर्कों की विस्तृत सुनवाई की संभावना है।