अनिल अंबानी और रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM) के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने धोखाधड़ी का नया केस दर्ज किया है। यह कार्रवाई बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) की शिकायत पर हुई है।
एजेंसी के मुताबिक, 2013 से 2017 के बीच कर्ज का उपयोग तय परियोजनाओं में नहीं किया गया और रकम को संबंधित इकाइयों में ट्रांसफर किया गया। शुरुआती जांच में बैंक को ₹2,220 करोड़ से ज्यादा के नुकसान की बात दर्ज की गई है।
सीबीआई ने गुरुवार को अनिल अंबानी के आवास और रिलायंस कम्युनिकेशंस के दफ्तरों पर तलाशी कार्रवाई की। अधिकारियों के अनुसार, छापे में लोन लेनदेन से जुड़े कई दस्तावेज और रिकॉर्ड जब्त किए गए हैं। इसी दिन अनिल अंबानी एक अलग मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) के सामने पेश हुए थे, जहां उनसे करीब नौ घंटे पूछताछ हुई। एजेंसी ने उन्हें अगली तारीख पर फिर बुलाया है।
FIR का आधार और आरोप
सूत्रो के मुताबिक सीबीआई का कहना है कि FIR सीधे बैंक ऑफ बड़ौदा की औपचारिक शिकायत पर दर्ज की गई। शिकायत में आरोप है कि RCOM ने बैंक से कर्ज लेने के बाद लोन शर्तों का पालन नहीं किया।
बैंक के मुताबिक, कर्ज की रकम का एक हिस्सा फर्जी या अनुचित लेनदेन दिखाकर समूह से जुड़ी कंपनियों में भेजा गया। एजेंसी ने इसे फंड डायवर्जन और आपराधिक साजिश का मामला माना है।
जांच दस्तावेजों में यह भी कहा गया है कि इस प्रक्रिया से बैंक को भारी वित्तीय नुकसान हुआ। FIR में अनिल अंबानी और संबंधित कंपनियों पर सोची-समझी साजिश के तहत बैंक को नुकसान पहुंचाने और खुद को लाभ देने का आरोप दर्ज है।
हाईकोर्ट स्टे हटने के बाद तेज हुई कार्रवाई
अधिकारियों के अनुसार, संबंधित खाता 2017 में ही गैर-निष्पादित आस्ति (NPA) घोषित किया जा चुका था। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दाखिल होने पर खाते को ‘फ्रॉड’ घोषित करने की प्रक्रिया पर रोक लग गई थी। यह रोक 23 फरवरी 2026 को हटने के बाद बैंक ऑफ बड़ौदा ने नई शिकायत दी। इसके बाद सीबीआई ने केस दर्ज कर जांच शुरू की।
जांच एजेंसियों का कहना है कि कोर्ट से स्टे हटने के बाद संस्थागत स्तर पर लंबित कदम तेजी से आगे बढ़ाए गए। इसी क्रम में छापे, रिकॉर्ड संग्रह और संबंधित पक्षों से पूछताछ की कार्रवाई की गई।
कर्ज की रकम कहां गई: शिकायत में क्या विवरण
शिकायत के अनुसार, रिलायंस कम्युनिकेशंस (RCOM), रिलायंस इंफ्राटेल (RITL) और रिलायंस टेलीकॉम (RTL) ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों से मिलाकर ₹31,580 करोड़ जुटाए थे। बैंक का आरोप है कि इस राशि का बड़ा हिस्सा मूल उद्देश्य से अलग इस्तेमाल हुआ।
दर्ज विवरण में कहा गया है कि ₹6,265.85 करोड़ दूसरे बैंकों के कर्ज चुकाने में लगाए गए। ₹5,501.56 करोड़ समूह से जुड़ी कंपनियों को दिए गए। ₹3,674.85 करोड़ को फिक्स्ड डिपॉजिट और म्यूचुअल फंड में लगाया गया और बाद में उसे निकालकर अन्य पक्षों को भुगतान किया गया। बैंक ने इन लेनदेन को लोन शर्तों के खिलाफ बताया है।
शिकायत में रिलायंस इंफ्राटेल का भी विशेष उल्लेख है। बैंक का कहना है कि RITL द्वारा जुटाए गए ₹1,783.65 करोड़ का उपयोग भी RCOM की देनदारियां चुकाने या संबद्ध इकाइयों को ट्रांसफर करने में किया गया। जांच में इन ट्रांसफर की प्रकृति, मंजूरी प्रक्रिया और लेखा प्रविष्टियों की भी पड़ताल की जा रही है।
NPA घोषणा से FIR तक का क्रम
रिकॉर्ड के मुताबिक, खाते को 5 जून 2017 को NPA घोषित किया गया था, क्योंकि समय पर भुगतान नहीं हुआ। बाद की बैंक जांच में फंड उपयोग पर सवाल उठे। इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर बैंक ने धोखाधड़ी की शिकायत आगे बढ़ाई।
सीबीआई के अनुसार, उपलब्ध सामग्री से यह संकेत मिला कि फंड का उपयोग तय व्यवसायिक लक्ष्य की बजाय अलग उद्देश्यों में किया गया। एजेंसी अब दस्तावेजी साक्ष्य, बैंकिंग चैनल, संबंधित पक्षों के खातों और स्वीकृति नोटिंग का मिलान कर रही है।
SBI वाले मामले से अलग केस
जांच एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि यह मामला पहले दर्ज SBI नेतृत्व वाले कंसोर्टियम केस से अलग है। SBI की शिकायत 11 बैंकों के समूह से जुड़े एक अलग कर्ज ढांचे पर आधारित थी। बैंक ऑफ बड़ौदा उस कंसोर्टियम का हिस्सा नहीं था।
सीबीआई ने कहा कि मौजूदा FIR बैंक ऑफ बड़ौदा, तत्कालीन विजया बैंक और देना बैंक से जुड़े अलग लोन खातों की जांच पर केंद्रित है। इसलिए इस केस में बैंकिंग दस्तावेज, उधारी शर्तें और लेनदेन की श्रृंखला अलग आधार पर जांची जा रही है।
फिलहाल एजेंसी जब्त दस्तावेजों का फोरेंसिक और वित्तीय विश्लेषण कर रही है। आगे आरोप तय करने, संबंधित अधिकारियों की भूमिका जांचने और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त धाराएं जोड़ने का फैसला जांच प्रगति के आधार पर होगा।