इंदौर में PMLA केस खत्म, मूल अपराध नहीं होने पर इनफ़ोर्समेंट डायरेक्टोरेट की कार्रवाई रद्द, सिनर्जी हॉस्पिटल के सुबोध जैन को राहत

इंदौर में शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में विशेष न्यायाधीश (पीएमएलए एक्ट) संतोष चौहान की अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) का खात्मा प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया है। यह मामला सिनर्जी हॉस्पिटल के डॉ. सुबोध जैन और अन्य के खिलाफ दर्ज ईसीआईआर से संबंधित था, जिसे ईडी ने 31 मार्च 2016 को दर्ज किया था। अदालत के इस आदेश के बाद उक्त ईसीआईआर में आगे की कार्यवाही समाप्त मानी जाएगी।

ईडी ने अदालत को बताया कि उसके मनी लॉन्ड्रिंग मामले का आधार जिन मूल आपराधिक मामलों पर था, वे अब अस्तित्व में नहीं हैं। शिकायतकर्ताओं की ओर से धोखाधड़ी और छल के आरोपों में विजय नगर थाने में दर्ज दो एफआईआर के संबंध में खात्मा प्रतिवेदन पहले ही पेश हो चुका था और उसे जेएमएफसी कोर्ट ने 16 दिसंबर 2023 को स्वीकार कर लिया था। इसी आधार पर ईडी ने कहा कि जब मूल अपराध ही शेष नहीं है, तो ईसीआईआर का प्रचलन जारी नहीं रह सकता।

मूल अपराध खत्म होने पर PMLA कार्यवाही का प्रभाव

मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों में यह स्थापित सिद्धांत है कि ईडी की कार्यवाही आमतौर पर उस “शेड्यूल्ड ऑफेंस” या मूल अपराध से जुड़ी होती है, जिससे कथित अवैध आय उत्पन्न होने का आरोप बनता है। ईडी ने अपने प्रतिवेदन में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ के न्याय दृष्टांत का हवाला देते हुए यही कानूनी स्थिति रखी कि मूल अपराध का अस्तित्व खत्म होने पर PMLA के तहत मामला प्रचलन योग्य नहीं रहता। अदालत ने इस तर्क को स्वीकार किया और खात्मा प्रतिवेदन मंजूर कर लिया।

कानूनी रूप से इसका अर्थ यह है कि केवल मनी लॉन्ड्रिंग की धारा का हवाला देकर मुकदमा चलाना पर्याप्त नहीं माना जाएगा, यदि उससे जुड़ा मूल आपराधिक मामला न्यायालयी स्तर पर समाप्त हो चुका हो। इंदौर की इस कार्यवाही में भी अदालत ने इसी सिद्धांत के अनुरूप आदेश पारित किया।

मामले का क्रम और अदालत में पेश स्थिति

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, ईडी ने 31 मार्च 2016 को सिनर्जी हॉस्पिटल के डॉ. सुबोध जैन एवं अन्य के विरुद्ध ईसीआईआर दर्ज की थी। बाद में, जिन शिकायतों को आधार बनाकर यह मामला आगे बढ़ा था, उन पर दर्ज एफआईआर की स्थिति बदल गई। विजय नगर थाने की दोनों एफआईआर में खात्मा प्रतिवेदन दाखिल हुआ और जेएमएफसी कोर्ट ने 16 दिसंबर 2023 को उसे स्वीकार कर लिया।

इसके बाद ईडी ने विशेष पीएमएलए कोर्ट में अपना खात्मा प्रतिवेदन दाखिल किया। एजेंसी का स्पष्ट कहना था कि जब मूल आरोपों की न्यायिक परिणति खात्मे में हो चुकी है, तब PMLA की ईसीआईआर को जारी रखना कानून की दृष्टि में उपयुक्त नहीं है। सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश संतोष चौहान की अदालत ने ईडी का प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया।

PMLA कानून का संदर्भ

शोधन निवारण अधिनियम, 2002 देश में अवैध तरीके से अर्जित धन को वैध रूप में दिखाने की प्रक्रिया रोकने के लिए लागू किया गया था। यह कानून 1 जुलाई 2005 से प्रभावी है और इसके तहत संदिग्ध लेनदेन, संबंधित संपत्ति और आर्थिक अपराध के स्रोत की जांच की जाती है। बैंक, वित्तीय संस्थानों और मध्यस्थों की रिपोर्टिंग व अनुपालन व्यवस्था भी इस ढांचे का हिस्सा है।

इंदौर के इस प्रकरण में अदालत का आदेश उस बिंदु पर केंद्रित रहा कि PMLA की कार्यवाही स्वतंत्र रूप से नहीं, बल्कि मूल अपराध की उपलब्धता के साथ पढ़ी जाती है। इसलिए जहां मूल अपराध पर न्यायालय खात्मा स्वीकार कर चुका हो, वहां मनी लॉन्ड्रिंग मामले की निरंतरता पर अदालतें उसी कानूनी कसौटी से निर्णय लेती हैं।

इस आदेश के साथ डॉ. सुबोध जैन और अन्य के खिलाफ दर्ज ईसीआईआर पर फिलहाल न्यायिक कार्यवाही का समापन हो गया है।