मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में स्थित नरसिंहगढ़ का चिड़ीखोह अभयारण्य जल्द नए इको-टूरिज्म ढांचे के साथ सामने आ सकता है। वन विभाग ने इस क्षेत्र को संगठित इको-टूरिज्म हब के रूप में विकसित करने की कार्ययोजना तैयार कर ली है। योजना में ट्रैकिंग मार्ग, स्थायी नाइट कैंप और जंगल सफारी रूट का विस्तार शामिल है। विभाग का कहना है कि जरूरी स्वीकृतियां मिलते ही चरणबद्ध तरीके से काम शुरू कर दिया जाएगा।
अभयारण्य में फिलहाल करीब 5 किमी के निर्धारित मार्ग पर निजी वाहनों से जंगल सफारी की अनुमति है। अब इसे बढ़ाकर 10 किमी तक ले जाने का प्रस्ताव शासन स्तर पर भेजा गया है। शुरुआती चरण में मौजूदा मार्ग को मजबूत किया जाएगा। इसके बाद नए वन क्षेत्र को जोड़कर सफारी रूट का विस्तार किया जाएगा। विस्तार पूरा होने पर पर्यटक खुली जीप और निजी वाहनों से लंबा वन भ्रमण कर सकेंगे।
वन विभाग ने पर्यटन को धार्मिक और प्राकृतिक स्थलों से जोड़ने की भी योजना बनाई है। इसके तहत छोटो महादेव मंदिर से चिड़ीखोह रेस्ट हाउस तक ट्रैकिंग रूट विकसित किया जाएगा। इसके अलावा वन ग्राम कोटरा तक नया ट्रेकिंग मार्ग तैयार करने का प्रस्ताव है। विभाग की योजना है कि वर्षा ऋतु शुरू होने से पहले इन मार्गों को तैयार कर पर्यटकों के लिए खोला जाए।
ट्रैकिंग मार्ग पर सुरक्षा और गाइड की व्यवस्था
प्रस्तावित ट्रैक रूट पर सुरक्षा संकेतक, विश्राम बिंदु और प्रशिक्षित गाइड उपलब्ध कराए जाएंगे। विभाग के अनुसार इसका उद्देश्य ट्रैकिंग को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाना है। इससे आगंतुक जैव विविधता, वनस्पति और प्राकृतिक परिदृश्य को नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से देख सकेंगे। नरसिंहगढ़ क्षेत्र को लंबे समय से मालवा के मिनी कश्मीर के रूप में भी जाना जाता है, इसलिए यहां प्रकृति-आधारित पर्यटन की संभावनाएं अधिक मानी जा रही हैं।
स्थानीय स्तर पर तैयारी का फोकस दो बातों पर रखा गया है। पहली, पर्यटक गतिविधियों की वहन क्षमता का ध्यान रखा जाए। दूसरी, जंगल के संवेदनशील हिस्सों में दबाव नियंत्रित रहे। इसी कारण ट्रैकिंग और सफारी विस्तार को चरणों में लागू करने का ढांचा बनाया गया है। विभाग का दावा है कि सभी गतिविधियां पर्यावरणीय संतुलन और संरक्षण को प्राथमिकता देकर संचालित होंगी।
कोटरा जंगल क्षेत्र में स्थायी नाइट कैंप
अभयारण्य से सटे कोटरा जंगल में स्थायी इको-टूरिस्ट नाइट कैंप विकसित करने की तैयारी आगे बढ़ चुकी है। विभाग के अनुसार इस हिस्से को औपचारिक मंजूरी मिल गई है। प्रस्तावित कैंप में रात्रि प्रवास, स्थानीय भोजन, गाइडेड नेचर ट्रेल और वन्यजीव दर्शन जैसी सुविधाएं दी जाएंगी। कैंप ढांचा पर्यावरण-अनुकूल सामग्री और डिजाइन के साथ विकसित करने की योजना है, ताकि प्राकृतिक संरचना पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।
नाइट कैंप और ट्रैकिंग गतिविधियों के शुरू होने से आसपास के गांवों को सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है। ग्रामीण युवाओं को गाइड, वाहन चालक, कैंप प्रबंधन और सहायक सेवाओं में काम मिल सकता है। विभाग ने यह भी संकेत दिया है कि पर्यटन से मिलने वाली आय का एक हिस्सा वन और वन्यजीव संरक्षण कार्यों पर खर्च किया जाएगा। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और संरक्षण, दोनों को साथ लेकर चलने का मॉडल तैयार किया जा सकेगा।
यह पूरा बदलाव उस पृष्ठभूमि में हो रहा है, जहां अभी तक क्षेत्र में सीमित दूरी की सफारी और बुनियादी पर्यटन गतिविधियां ही उपलब्ध थीं। नई योजना के लागू होने पर पर्यटकों को एकीकृत अनुभव मिलेगा, जिसमें धार्मिक स्थल, ट्रैकिंग, डे-सफारी और नाइट स्टे जैसे विकल्प एक ही परिक्षेत्र में जुड़ेंगे।
“कैंपों की स्वीकृति मिल गई है। ट्रैकिंग रूट बारिश के पहले चालू कर देंगे। सफारी विस्तार के लिए प्रस्ताव भेजा है, स्वीकृति मिलते ही इसका काम भी शुरू कराएंगे।” — दिनेश यादव, एसडीओ, चिड़ीखोह अभयारण्य, नरसिंहगढ़
फिलहाल अगला अहम चरण शासन से सफारी विस्तार की मंजूरी है। इसके बाद काम की टाइमलाइन और संचालन ढांचे को अंतिम रूप दिया जाएगा। विभाग का कहना है कि लक्ष्य पर्यटन बढ़ाना भर नहीं, बल्कि नियंत्रित और जिम्मेदार इको-टूरिज्म के जरिए जंगल और स्थानीय समुदाय, दोनों को समान लाभ पहुंचाना है।