सिंगरौली-सीधी कोल ब्लॉक मामले में NGT का नोटिस, केंद्र-एमपी व अडानी समूह से 4 हफ्ते में जवाब

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने सिंगरौली-सीधी क्षेत्र में कोयला खनन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार, मध्य प्रदेश सरकार, अडानी समूह और नेशनल वाइल्डलाइफ बोर्ड को नोटिस जारी किया है। मामला कोल ब्लॉक आवंटन और उसे मिली पर्यावरणीय स्वीकृति की वैधता से जुड़ा है। ट्रिब्यूनल ने सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति अफरोज अहमद की पीठ ने सुनवाई के दौरान दिया। पीठ ने मामले की अगली तारीख 22 अप्रैल 2026 निर्धारित की है। याचिका पर्यावरणविद अजय दुबे की ओर से दाखिल की गई है, जिसमें मई 2025 में जारी पर्यावरणीय स्वीकृति को चुनौती दी गई है।

याचिका में क्या-क्या सवाल उठे

याचिका के अनुसार सिंगरौली के घने वन क्षेत्र में लगभग 1500 हेक्टेयर वन भूमि को कोयला खनन के लिए आवंटित किया गया। याचिकाकर्ता का कहना है कि वन विभाग की पूर्व साइट सर्वेक्षण रिपोर्ट इस इलाके को प्रस्तावित एलिफेंट कॉरिडोर का हिस्सा बताती है। इसी आधार पर याचिका में तर्क दिया गया कि ऐसे कॉरिडोर की 10 किलोमीटर परिधि में खनन गतिविधियों की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

याचिका में यह भी कहा गया कि संबंधित क्षेत्र में पेड़ों की कटाई शुरू होने के बाद पर्यावरणीय जोखिम बढ़ा और तब न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी। इस पृष्ठभूमि में ट्रिब्यूनल से पर्यावरणीय मंजूरी और आवंटन प्रक्रिया की वैधता की न्यायिक जांच की मांग की गई।

उच्चस्तरीय समिति की 2024 रिपोर्ट का हवाला

मामले में अप्रैल 2024 में गठित एक उच्चस्तरीय समिति की रिपोर्ट को भी महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया गया है। समिति ने स्थल निरीक्षण के बाद अपनी रिपोर्ट में कोयला उत्खनन के विरुद्ध अनुशंसा की थी। रिपोर्ट में क्षेत्र को जैव-विविधता से समृद्ध वन बताया गया और कहा गया कि यहां हाथियों सहित कई वन्यजीवों की नियमित आवाजाही होती है।

समिति ने यह भी चेताया था कि प्रस्तावित खनन गतिविधियों से वन्यजीव आवास को गंभीर नुकसान हो सकता है। इसी रिपोर्ट के आधार पर याचिका पक्ष ने कहा कि पर्यावरणीय मंजूरी देते समय उपलब्ध वैज्ञानिक और प्रशासनिक सामग्री पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया।

एलिफेंट कॉरिडोर की औपचारिक अधिसूचना पर विवाद

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ राधेलाल गुप्ता ने दलील दी कि सर्वोच्च न्यायालय और NGT के पूर्व आदेशों के बावजूद सिंगरौली-सीधी क्षेत्र को अब तक औपचारिक रूप से एलिफेंट कॉरिडोर घोषित नहीं किया गया है। उनका कहना था कि केंद्र सरकार ने लोकसभा में शपथपत्र के माध्यम से इस क्षेत्र को प्रस्तावित कॉरिडोर माना, लेकिन अधिसूचना जारी नहीं हुई।

याचिका पक्ष का तर्क है कि अधिसूचना में देरी के बीच खनन अनुमति और साइट गतिविधियां आगे बढ़ना संरक्षण कानूनों की मंशा के विपरीत हो सकता है। इसी बिंदु पर ट्रिब्यूनल के समक्ष अब कानूनी प्रश्न यह है कि प्रस्तावित कॉरिडोर की स्थिति में पर्यावरणीय अनुमति का मानक क्या होना चाहिए और किस स्तर की सावधानी अनिवार्य है।

अब आगे क्या

NGT के नोटिस के बाद संबंधित एजेंसियों और पक्षकारों को अपने-अपने जवाब और दस्तावेज दाखिल करने होंगे। चार सप्ताह की समयसीमा के बाद मामले में रिकॉर्ड पर उपलब्ध रिपोर्ट, पर्यावरणीय मंजूरी की शर्तें, वन एवं वन्यजीव संरक्षण से जुड़े नियम और पूर्व न्यायिक आदेशों का परीक्षण होगा।

22 अप्रैल 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में ट्रिब्यूनल प्रारंभिक आपत्तियों, अनुमतियों की प्रक्रिया और स्थल की पारिस्थितिक स्थिति पर प्रस्तुत सामग्री की समीक्षा कर सकता है। फिलहाल यह मामला सिंगरौली-सीधी के प्रस्तावित एलिफेंट कॉरिडोर, कोल ब्लॉक आवंटन और पर्यावरणीय स्वीकृति के बीच संतुलन से जुड़े अहम परीक्षण के रूप में देखा जा रहा है।